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सूत्रकृमि प्रबंधन विषय पर जनजाति किसानों का एकदिवसीयप्रशिक्षण आयोजित,विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से बढ़ेगी फसल उत्पादकता*

By Goapl Gupta · 23 Feb 2026 · 12 views
   *सूत्रकृमि प्रबंधन विषय पर जनजाति किसानों का एकदिवसीयप्रशिक्षण आयोजित,विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से बढ़ेगी फसल उत्पादकता*
उदयपुर जनतंत्र की आवाज विवेक अग्रवाल। महाराणा प्रतापकृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में संचालित अखिल भारतीय समन्वितअनुसंधान सूत्रकृमिप्रबंधन परियोजना के संयुक्त तत्वावधान में जनजाति किसानों हेतु एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजनकृषि विज्ञान केंद्र, बांसवाड़ामें सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य जनजाति क्षेत्रों के किसानोंको सूत्रकृमि (निमेटोड) जनित रोगों की पहचान, रोकथाम एवं समेकितप्रबंधन की वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करना था, जिससे वे अपनी फसलों की उत्पादकता एवंगुणवत्ता में वृद्धि कर सकें।कार्यक्रमका शुभारंभ विशेषज्ञों के स्वागत एवं प्रशिक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत करने के साथहुआ। प्रशिक्षण में क्षेत्र के प्रगतिशील जनजाति किसानों ने उत्साहपूर्वक भागलिया। वैज्ञानिकों ने किसानों को सरल एवं व्यवहारिक भाषा में सूत्रकृमियों के जीवनचक्र, उनकेप्रसार के कारणों तथा फसलों पर उनके प्रतिकूल प्रभावों के बारे में विस्तार सेजानकारी दी।सूत्रकृमिपरियोजना प्रभारी डॉ. हेमेंद्र शर्मा नेअपने व्याख्यान में बताया कि सूत्रकृमि सूक्ष्म जीव  होते हैं जो मृदाएवं पौधों की जड़ों में रहकर फसलों को गंभीर क्षति पहुंचाते हैं। उन्होंने बतायाकि इनके प्रकोप से पौधों की जड़ें गांठदार हो जाती हैं, पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता हैतथा उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आती है। डॉ. शर्माने समेकित प्रबंधन (आईपीएम) की अवधारणा पर जोर देते हुए जैविक,यांत्रिक एवंरासायनिक उपायों के संतुलित उपयोग की सलाह दी।उन्होंने विशेष रूपसे पॉलीहाउस में उगाई जाने वाली सब्जी फसलों में सूत्रकृमियों की समस्या पर प्रकाशडालते हुए बताया कि संरक्षित खेती में निरंतर एक ही फसल लेने से इनका प्रकोप बढ़सकता है। इसके समाधान हेतु उन्होंने फसल चक्र अपनाने, सौर्यकरण (सोलराइजेशन),जैव-नियंत्रण एजेंट्स के उपयोग तथा स्वस्थरोपाई सामग्री के चयन की सलाह दी।सूत्रकृमिविशेषज्ञ डॉ. चंद्र प्रकाश नामा नेफलदार वृक्षों में सूत्रकृमियों के प्रभावी प्रबंधन पर विस्तार से जानकारी दी।उन्होंने बताया कि अनार, अमरूद,साइट्रस एवं अन्य फलवृक्षों में सूत्रकृमि जड़ों को प्रभावित कर वृक्षों की वृद्धि एवं फलन क्षमता कोकम कर देते हैं। उन्होंने मृदा परीक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा किनियमित परीक्षण से समस्या की प्रारंभिक अवस्था में पहचान कर उचित उपचार संभव है। डॉ. नामा ने किसानों को जैविक खाद, नीम खली, ट्राइकोडर्मा एवंअन्य जैव-एजेंट्स के प्रयोग केलाभ बताए तथा रासायनिक नियंत्रण उपायों को अंतिम विकल्प के रूप में अपनाने की सलाहदी। उन्होंने यह भी कहा कि वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाकर किसान कम लागत में बेहतरउत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।कृषिविज्ञान केंद्र, बांसवाड़ाके प्रभारी डॉ. बी. एस. भाटी ने किसानों को सूत्रकृमियों के प्रमुख लक्षणों की पहचानके बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यदि पौधों की वृद्धि रुक जाए, पत्तियां पीली पड़नेलगें अथवा जड़ों में गांठें दिखाई दें तो यह सूत्रकृमि प्रकोप का संकेत हो सकताहै। उन्होंने किसानों को खेत में नियमित निरीक्षण करने एवं समय पर वैज्ञानिक सलाहलेने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. जी. एल.कोठारी द्वाराप्रभावी ढंग से किया गया। प्रशिक्षण के दौरान किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान भीविशेषज्ञों द्वारा किया गया, जिससेकार्यक्रम अत्यंत संवादात्मक एवं उपयोगी सिद्ध हुआ।इसप्रशिक्षण कार्यक्रम में 7 महिलाकृषकों सहित कुल 35 प्रगतिशीलजनजाति किसानों ने सक्रिय भागीदारी की। किसानों ने इस प्रकार के वैज्ञानिकप्रशिक्षण को अत्यंत लाभकारी बताते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन कीअपेक्षा व्यक्त की। प्रशिक्षण के उपरांत सभी प्रतिभागीकिसानों को ऑटोमेटिक स्प्रेयर एवं उन्नत सब्जी बीजों का निःशुल्क वितरण किया गया,ताकि वे प्रशिक्षणमें प्राप्त ज्ञान को अपने खेतों में व्यवहारिक रूप से लागू कर सकें। विश्वविद्यालयके वैज्ञानिकों ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमजनजाति क्षेत्र के किसानों की आय वृद्धि, सतत कृषि विकास एवं आधुनिक तकनीकों के प्रसार में महत्वपूर्णभूमिका निभाएंगे।                      

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