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पाश्चात्य संस्कृति का त्याग: बाल व्यास शुकदेव का जन्मदिन वैदिक तिथि और 'जगन्नाथ कीर्तन' के साथ मनाया गया

By Goapl Gupta · 24 Feb 2026 · 21 views
पाश्चात्य संस्कृति का त्याग: बाल व्यास शुकदेव का जन्मदिन वैदिक तिथि और 'जगन्नाथ कीर्तन' के साथ मनाया गया
विशेष रिपोर्ट: आज के आधुनिक दौर में जहां जन्मदिन पर केक काटना और पाश्चात्य तरीके से जश्न मनाना आम हो गया है, वहीं एक परिवार ने अपनी सनातन संस्कृति की ओर लौटते हुए समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। संस्कृत व्याख्याता और कथावाचक श्री सुनील हारित के 11 वर्षीय सुपुत्र, बाल व्यास शुकदेव का जन्मदिवस अंग्रेजी तारीख के बजाय भारतीय पंचांग के अनुसार 'फाल्गुन शुक्ल षष्ठी' को पूरी तरह से सात्विक और आध्यात्मिक रूप में मनाया गया।
इस अवसर पर किसी भी प्रकार के पाश्चात्य जश्न (केक या कैंडल) का पूर्णतया त्याग किया गया। इसके स्थान पर परिवार, मित्रों और बच्चों के साथ मिलकर भगवान श्री जगन्नाथ का आनंदमयी संकीर्तन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण शुकदेव के 8 वर्षीय छोटे भाई 'परीक्षित' रहे, जिन्होंने अपने नन्हे हाथों से पियानो पर कीर्तन की अद्भुत धुनों की संगत कर उपस्थित जनों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
तिथि से जन्मदिन मनाने का दोहरा लाभ:
श्री सुनील हारित ने बताया कि पाश्चात्य तारीखों की जगह सनातन 'तिथि' से जन्मदिन मनाने से हम अपनी वैदिक परंपराओं से तो जुड़ते ही हैं, साथ ही आज के साइबर युग में हमारी व्यक्तिगत जन्मतिथि (DOB) के 'डिजिटल लीक' होने का खतरा भी पूरी तरह समाप्त हो जाता है। यह डिजिटल सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण का एक बेहतरीन संगम है।
8 वर्ष की आयु से ही गीता और भागवत कंठस्थ:
उल्लेखनीय है कि बाल व्यास शुकदेव विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने बहुत छोटी सी आयु में ही संपूर्ण भगवद्गीता (18 अध्याय, 700 श्लोक) अर्थ व संगीत सहित कंठस्थ कर ली है। इसके अलावा उन्हें श्रीमद्भागवत के सैकड़ों क्लिष्ट श्लोक मुज़ुबानी याद हैं। वे वाल्मीकि रामायण, नानी बाई को मायरो के साथ-साथ अंग्रेजी (English) भाषा में भी 'हनुमत् कथा' का धाराप्रवाह वाचन करते हैं। वहीं उनके छोटे भाई परीक्षित मात्र 8 वर्ष की आयु में पियानो और ताल पर सुंदरकांड व किष्किंधाकांड का सस्वर गायन करते हैं।
इस अवसर पर उपस्थित प्रबुद्धजनों ने हारित परिवार के इस कदम की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि भावी पीढ़ी में शास्त्रों और संस्कारों का ऐसा बीजारोपण ही सनातन धर्म की सच्ची रक्षा है। दोनों बालकों को समाज के वरिष्ठ जनों द्वारा इस पुनीत मार्ग पर आगे बढ़ने का आशीर्वाद प्रदान किया गया।

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