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साधु के मुख्य रूप से दो ही काम माने जाते हैं- ज्ञान और ध्यान:आचार्य विहर्ष सागर जी आचार्यश्री के सानिध्य में विघ्नहरण पाश्र्वनाथ विधान शनिवार को

By Goapl Gupta · 06 Mar 2026 · 23 views
साधु के मुख्य रूप से दो ही काम माने जाते हैं- ज्ञान और ध्यान:आचार्य विहर्ष सागर जी
आचार्यश्री के सानिध्य में विघ्नहरण पाश्र्वनाथ विधान शनिवार को

उदयपुर। श्री आदिनाथ भवन सेक्टर 11 उदयपुर में विराजमान आचार्य विहर्ष सागर जी महाराज के सानिध्य में आदिनाथ भवन सेक्टर 11 में शनिवार को विघ्नहरण पाश्र्वनाथ विधान की तैयारियां पूरी कर ली गई है। ट्रस्ट अध्यक्ष पारस चित्तौड़ा ने बताया कि शनिवार को विघ्नहरण पाश्र्वनाथ विधान होगा। विधान के सौधर्म इन्द्र अशोक कुमार कोठारी, धनपति कुबेर राजेन्द्र कोठारी एवं यज्ञ नायक जितेन्द्र चौधरी होंगे।
आदिनाथ भवन में प्रात:कालीन वेला में मांगलिक आयोजनों के तहत शुक्रवार प्रात: श्रीजी की शांति धारा अभिषेक हुआ। मदन देवड़ा महावीर सिंघवी अशोक शाह सुरेश वखेरिया, अशोक कोठारी, राजेंद्र कोठारी, भूपेंद्र जैन, मधु मदन चित्तौड़ा, पारस सिंघवी कैलाश चित्तौड़ा अर्जुन कोडीया आदि उपस्थित थे। धर्मसभा में दीप प्रज्वलन, आचार्यश्री को शास्त्र भेंट एवं आचार्यश्री के पाद प्रक्षालन जैसे मांगलिक आयोजनों के दोरान मदन देवड़ा, महावीर सिंघवी, अशोक शाह सुरेश वखेरिया, अशोक कोठारी, राजेंद्र कोठारी, भूपेंद्र जैन, मधु मदन चित्तौड़ा, पारस सिंघवी कैलाश चित्तौड़ा अर्जुन कोडीया आदि उपस्थित थे।
इस दौरान आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य विहर्ष सागर जी महाराज ने कहा कि दिगम्बर साधु की चर्या सबसे उत्कृष्ट एवं दुनिया के साधुओं से कुछ हटके होती है। दुनिया में साधु कहलाने वाले तो बहुत मिल जायेंगे लेकिन सही साधुता तो दिगंबरत्व में ही दिखाई देती है। यह उनकी चर्या पद्धति, कठोर तपस्या के कारण ही उनको एक अलग पहचान दिलाती है। साधु के दो ही काम कहे है- ज्ञान और ध्यान। साधुता में प्रवेश इन्ही कारणों से होता है। साधु की कोई भी प्रवृत्ति एकदम सहज और उपदेश देन वाली होती है। साधु आहार भी लेते है तो संयम, तप, ध्यान और विज्ञान के गुण की वृद्धि एवं रक्षा के लिए। इन कारणों के अलावा आहार लेने वाला साधु निश्चित अपने संसार को बढ़ा रहा है। जिनकी जीभ हमेशा लपालप रहती है वह साधु नहीं बन सकते। दुनिया में देखा जाता है कि लोगों को खाने को तो भरपूर चाहिए लेकिन पचाने कि लिए कोई कुछ नहीं करना चाहता। लोगों को अपनी आमदनी का कुछ पैसा तो जीभ में लगाना पड़ता है क्योंकि खाने में तो ब्रेड, पिज़्ज़ा जैसे फ़ास्ट फ़ूड और काम-मेहनत के नाम पर कुछ भी नहीं करना। औरतें अगर घर का काम अपने हाथो से ही करने लग जाए तो अलग से व्यायाम करने कही जाना नहीं पड़ेगा। जिनशासन में योग-साधना के अंतर्गत कायोत्सर्ग करते ही श्वासोंच्छवास की क्रिया बताई है। इससे जीवन पूर्ण रूप से स्वावलंबि बन जाता है।
आचार्यश्री ने स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिसे इस लोक की इच्छा, पर लोक की वांछा न हो और जिनका आहार और विहार भी युक्त हो वही सच्चा मुनि है। युक्त से तात्पर्य है व्यवस्थित एवं विवेकपूर्ण। हमारा शरीर कोई डस्टबीन नहीं है कि इसमें कुछ भी कचरा डालते जाए। ज़हर ही केवल ज़हर नहीं होता, अगर विवेकपूर्ण भोजन न किया जाए तो वह भी ज़हर का काम करता है। आज फ़ूड पोईजन कितनी जल्दी हो जाता है, क्योंकि मिश्रित भोजन होने लगे। लोग गुटखा मुँह खोलकर और आंक बंद करके खाते है और ध्यान नहीं रखते लेकिन अगर आपने जीवन में 25-30 लाख का इंतज़ाम कर लिया हो तो ही गुटखा खाते रहना ऐसे पदार्थों के सेवन से मृत्यु को निमंत्रण दे रहे है। आगे कहते है जो साधु आक्रोश करके आहार करते है वह आगे चलके व्यंतर बनते है। चाहे रोटी मिले की राबड़ी दोनो में सहजता, समता रखते है मुनि। जो पैसा लेकर आहार करे वह आहार नहीं लेते बल्कि जिनके यहाँ आहार होता है उनकी निर्मलता साधना के प्रभाव से पैसे वाला हो जाता है। ग़ुस्सा करके परेशान करना नहीं, श्रावक की परेशानी अपनी समता से दूर करना साधु का लक्षण है। चिल्लाना नहीं, चर्या करके धर्मध्यान करना साधुता है। इसलिए अपने में समता और सहजता विकसित करें जिससे जीवन आनन्दमयी बन सके।

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