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महावीर स्वामी की 2625वीं जन्म जयंती* --

By Goapl Gupta · 01 Apr 2026 · 16 views
*महावीर स्वामी की 2625वीं जन्म जयंती* -- कैलाश चंद्र कौशिक
जयपुर! जैन समाज और जैन मुनियों ने तीर्थंकरों को याद किया !
आज का विश्व एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ अशांति, संघर्ष और असहिष्णुता का वातावरण दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध जैसी स्थितियाँ बन रही हैं कहीं देश-देश के बीच टकराव है, तो कहीं आंतरिक कलह समाज को तोड़ रही है। ऐसी विषम परिस्थिति में मानवता एक बार फिर शांति, संयम और सत्य के मार्ग की ओर देख रही है। यही वह समय है जब हमें भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांतों की सबसे अधिक आवश्यकता है।
भगवान महावीर, जिन्हें वर्धमान के नाम से भी जाना जाता है, केवल एक धर्मगुरु नहीं थे, बल्कि वे मानवता के महान पथप्रदर्शक थे। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय और ब्रह्मचर्य जैसे सिद्धांतों के माध्यम से एक ऐसा जीवन-दर्शन दिया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था।
आज जब विश्व हिंसा और युद्ध की आग में झुलस रहा है—जहाँ शक्तिशाली राष्ट्र अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं और निर्दोष जन इसकी कीमत चुका रहे हैं वहीं महावीर स्वामी का अहिंसा का संदेश हमें याद दिलाता है कि “अहिंसा ही परम धर्म है।” यदि विश्व के नेता और समाज महावीर के इस सिद्धांत को अपनाएं, तो न केवल युद्ध टल सकते हैं, बल्कि स्थायी शांति भी स्थापित हो सकती है।
महावीर स्वामी का “जीओ और जीने दो” का संदेश आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो गया है। आज मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति, समाज और एक-दूसरे का शोषण कर रहा है। ऐसे में उनका अपरिग्रह (अत्यधिक संग्रह न करना) और सह-अस्तित्व का विचार हमें संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
सत्य और सहिष्णुता का उनका मार्ग भी आज की आवश्यकता है। वर्तमान में विचारों की असहिष्णुता और मतभेदों के कारण समाज में विभाजन बढ़ रहा है। महावीर स्वामी का अनेकांतवाद हमें सिखाता है कि हर दृष्टिकोण में कुछ न कुछ सत्य होता है, और हमें दूसरों के विचारों का सम्मान करना चाहिए।
*महावीर स्वामी की 2625वीं जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक अवसर है*
अपने भीतर झाँकने का, अपने आचरण को सुधारने का और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का। यदि हम वास्तव में महावीर स्वामी की जन्म जयंती मना रहे हैं तो हमें उनके बताए मार्ग पर चलना होगा।
आज की दुनिया को तकनीकी प्रगति के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक विकास की भी आवश्यकता है। बिना मूल्यों के विकास विनाश का कारण बन सकता है। इसलिए *वर्तमान को वर्धमान की आवश्यकता है।*

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