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वाजपेयी का जीवनभर रहा मेवाड़ से अटूट सम्बन्ध◆ ◆जन्म शताब्दी 25 दिसम्बर पर विशेष◆

By Gopal Gupta · 24 Dec 2025 · 296 views
वाजपेयी का जीवनभर रहा मेवाड़ से अटूट सम्बन्ध◆
◆जन्म शताब्दी 25 दिसम्बर पर विशेष◆



उदयपुर संवाददाता जनतंत्र की आवाज । भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष, पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेयी के सार्वजनिक व राजनीतिक जीवन में निरन्तर प्रवासों की श्रृंखला में मेवाड़ अंचल में उनके अनेक प्रवास हुए। वे मेवाड़ अंचल में केवल जिला मुख्य अपितु उपखंड, तहसील और नगरपालिका केन्द्र तक सर्वाधिक आमसभा करने वाले किसी भी राजनीतिक दल पहले राष्ट्रीय नेता अटलजी थे। मनाली के अटलजी को कोई शहर पसंद का था, तो वो है उदयपुर।
◆प्रमुख लोगों से परिचय◆
मेवाड़ में निरंतर प्रवास के कारण मेवाड़ के प्रमुख लोगों को वे नाम से जानते थे। मैनें उदयपुर प्रवास में उस समय के प्रमुख प्रेस फोटोग्राफर राधेश्याम बिलोची (रामा स्टूडियो) व उदयपुर में जनसंघ व भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता रहे सरदार रोशनसिंह को नाम से बुलाते सुना। वागड़ में सेनावासा के नवनीतलाल निनामा हो या बांसवाड़ा के श्रीपतराय दवे, नाथद्वारा के रामचंद्र बागोरा हो या चित्तोड़गढ़ के कैलाशचंद्र झंवर, प्रतापगढ़ के नंदलाल मीणा हो या निम्बाहेड़ा के श्रीचंद कृपलानी सभी से उनका व्यक्तिशः परिचय था। उदयपुर के अधिकाशः प्रवास में उनकी कार के सारथी रहे भाजपा नेता दलपत सुराणा को प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वो कभी नहीं भूले।
◆वो मेवाड़ी मनुहार से माने◆
अटलजी को मेवाड़ी भोजन प्रिय था। सत्तर के दशक में जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यसमिति बैठक के अवसर पर वरिष्ठ नेता मदनलाल मूंदडा ने अटलजी से घर भोजन करने आने का आग्रह किया। एक बार तो अटलजी ने कहा- मेरी तबियत ठीक नहीं , थकान है, नहीं आ सकूगां। मदनजी ने कहा- मैं स्नेह से मेवाड़ी भोजन दाल, बाटी और चूरमा बनवा रहा हूं, मेरी इच्छा है, आप अवश्य पधारें। अटलजी उनके स्नेहिल आग्रह को टाल नहीं सके। अटलजी ने अपनी चिरपरिचित शैली में बोले- दाल, बाटी और चूरमा बनवा रहे हो, तो जरुर आऊंगा।
◆भानुजी को ढांढस बधाया◆
1972 के विधानसभा चुनाव अभियान के मध्य उदयपुर के जनसंघ प्रत्याशी भानुकुमार शास्त्री के पिताजी का निधन हो गया। अटल जी दो दिन में अपना निर्धारित दौरा छोड़कर तुरंत उदयपुर आये। भानुजी से मिले, ढांढस बंधवाकर फिर मैदान में डटने को प्रेरित किया। अटलजी ने कहा कि- भानुजी मैदान में डट जाओ, आपकी विजय निश्चित है। अटलजी की भविष्यवाणी सत्य हुई, भानुजी चुनाव जीत गये।
◆निराशा में भी उदयपुर आये◆
प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को देश में मात्र दो सीट मिली। स्वयं दल के अध्यक्ष रहते हुए अटलजी अपने गृहनगर ग्वालियर में पौने दो लाख वोट से चुनाव हार गये। निराशा स्वाभाविक थी। उन्होंने अपने मित्र पूर्व सांसद् भानुकुमार शास्त्री को फोन किया, मै उदयपुर आ रहा हूं, आपके घर ही ठहरुगां। चार दिन उदयपुर रहकर श्रीनाथजी के दर्शन करके अटलजी पुनः दिल्ली जाकर कार्य में जुटे।
◆उदयपुर के रास्ते तक, जानते थे अटलजी◆
3 से 5 मार्च 1989 को उदयपुर में भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक थी। अटलजी अहमदाबाद से सड़क मार्ग द्वारा उदयपुर आये। युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष प्रमोद सामर, महामंत्री दिनेश भट्ट के साथ मैं भी उनके स्वागत में गया था। शहर में चेतक सर्कल से मोहता पार्क की ओर अगली कार मुडते ही अटलजी ने अपनी कार रुकवा दी और कहा सर्किट हाउस इधर है, आप मुझे कहां ले जा रहे है, तब प्रमोद सामर ने उन्हें बताया कि बैठक होटल पार्क में है, वहां आपकी प्रतीक्षा हो रही है। तब अटलजी आगे बढ़े।
◆मेवाड़ के गांव गांव घूमे अटलजी ◆
उदयपुर में दलपत सुराणा व वीरेन्द्र डांगी की मारुति कार और वेन में कई बार वे कार्यक्रमों व बैठकों में गये। उदयपुर में मुखर्जी चौक, बैंक तिराहा, गुलाबबाग, टाऊनहॉल, गांधी ग्राउंड में और मेवाड़ वागड़ में प्रतापगढ़, धरियावद, डुंगरपुर, बांसवाड़ा, भीम, फतहनगर, चावंड, चारभुजा, कांकरोली, आमेट, रेलमगरा, निम्बाहेड़ा सहित अनेक स्थानों पर एकाधिक बार अटलजी ने सभाएं की। धरियावद में सड़क किनारे कार रोक एक थडी पर चाय पीकर भुगतान करने की बात आज भी लोगों को याद है।
◆अटलजी की कीकरवाडी में सभा ◆
1980 के विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी गुलाब चंद कटारिया के समर्थन में हाथीवाले पार्क में सभा तय हुई। एक दिन पूर्व उस पार्क में अत्यधिक पानी छोड़ दिया गया। पार्क पानी व कीचड़ से भर गया, वहां सभा संभव नहीं थी। आनन फानन में कीकरवाडी में तिराहे पर मंच बनाकर सभा की गयी। स्थान छोटा था, लोग पेड़ों की शाखाओं पर भी बैठे थे, यह दृश्य देखकर अटलजी अभिभूत थे, उन्होनें कहा मैनें जीवन में ऐसी सभा नहीं देखी। संयोग से यह सभा भी प्रचार के अंतिम दिन थी। स्वयं कटारिया ने कई बार यह कहा कि अटलजी की उस सभा ने वो चुनाव जिता दिया। वो चुनाव कटारिया कांग्रेस प्रत्याशी शेषमल पगारिया से एक हजार से भी कम वोट से जीते थे।
◆कार्यकर्ता की जीप में बैठे◆
1991 के लोकसभा चुनाव में डबोक हवाईअड्डे पर किसी पदाधिकारी को न पाकर अटलजी डबोक के शंकरलाल पालीवाल की पुरानी जीप में बैठकर गुलाबबाग सभा स्थल पर पहूचे और वापसी में जब पदाधिकारियों ने दूसरी गाडी में बैठने को कहा तो अटलजी ने कहा ये मुझे ससम्मान लेकर आया है, मै इसी के साथ वापस जाऊगां। यह भी संयोग है कि अटलजी के विदेश मंत्री कार्यकाल में उदयपुर निवासी जगत मेहता उनके साथ विदेश सचिव रहे। उदयपुर प्रवास में अटलजी उनके घर व संस्थान में भी गये। तब भाजपा नेता धर्मनारायण जोशी व विरेन्द्र डांगी उनके साथ थे।
◆प्रधानमंत्री बनकर भी उदयपुर को नहीं भूले◆
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे मेवाड़ को नहीं भूले। 1996 के वर्षांत में छुट्टियां बिताने के लिये अटलजी उदयपुर आये और जयसमंद झील में बने रिसोर्ट में रुके। तब उदयपुर में मिण्डाजी की बाड़ी में सहभोज हुआ। अटलजी ने वरिष्ठ नेता भानुकुमार शास्त्री व जिलाध्यक्ष मांगीलाल जोशी की मौजूदगी में कार्यकर्ताओं से गपशप की। यहां पर लोकेश द्विवेदी ने अटलजी को उनकी शैली में उनकी कविता सुनाई। तब अटलजी ने कहा भाई यहां तो ओरिजनल स्वयं मौजूद है।
◆वो अघोषित रैली◆
उनके सक्रिय राजनीति में रहते ऐसा कोई लोकसभा या विधानसभा चुनाव शायद ही हुआ हो, जब उदयपुर में उनकी आमसभा न हुई हो। 1980 के चुनाव प्रचार के अंतिम दिन गांधी ग्राउंड में अटलजी की सभा थी। वे समय पर नहीं पहूच सके, प्रचार बंद हो गया। अगले दिन सुबह अटलजी भाजपा प्रत्याशी भानुकुमार शास्त्री के साथ जीप में सवार होकर उदयपुर की सडकों पर निकले। लोगों ने अभूतपूर्व स्वागत किया, जनता अटलजी को अपने मध्य पाकर अभिभूत थे। कांग्रेस प्रत्याशी मोहनलाल सुखाड़िया ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की। आयोग ने अटलजी को तलब किया। अटलजी ने आयोग को उत्तर भेजा, यह सही है कि उस समय प्रचार का समय समाप्त हो गया था, लेकिन उसके बाद जनसम्पर्क हो सकता है। मैनें जनसम्पर्क किया, मैनें सभा नहीं की, माईक का उपयोग नहीं किया। अंततः आयोग ने अटलजी की दलील स्वीकार की। इसकी चर्चा अटलजी ने स्वयं अगले चुनाव की सभा में स्वयं की।
" वाजपेयी को शत-शत नमन, जन्म-शताब्दी की मंगल बधाई,
राष्ट्रधर्म की ज्योति जलाई,
वाणी ने सत्य की राह दिखाई।
कवि-हृदय, राजधर्म का तप, सौम्यता में भी दृढ़ अभिमान,
शब्द बने सेतु, नीति बनी मर्यादा, यही था उनका पहचान।
विप्लवी नत-मस्तक होकर कहे—अटल युग अमर कहलाएं।

डॉ. विजय विप्लवी
उदयपुर
फाग उत्सव

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