जीव कौन है और कहाँ है? — आत्मस्वरूप की पहचान ही धर्म का प्रथम सोपान : डॉ. निलेश शास्त्री
By Goapl Gupta ·
29 Jun 2026 ·
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जीव कौन है और कहाँ है? — आत्मस्वरूप की पहचान ही धर्म का प्रथम सोपान : डॉ. निलेश शास्त्री
उदयपुर संवाददाता विवेक अग्रवाल। धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए सर्वप्रथम जीव को जानना आवश्यक है, क्योंकि जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं पहचानता, तब तक धर्म का वास्तविक प्रवेश नहीं हो सकता। यह विचार विद्वान प्रवचनकार डॉ. निलेश शास्त्री ने अपने विशेष व्याख्यान जीव कौन है और कहाँ है? में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि जीव अरूपी होने के कारण प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता, इसलिए उसकी पहचान उसके ज्ञान-स्वभाव से की जा सकती है। जहाँ ज्ञान है, वहाँ जीव का अस्तित्व है। उन्होंने श्रोताओं के समक्ष प्रश्न रखा कि यदि ज्ञान पर-वस्तु, इन्द्रियों या मन से उत्पन्न होता है, तो वह हर समय और सभी व्यक्तियों में समान रूप से होना चाहिए, जबकि ऐसा नहीं होता।
डॉ. शास्त्री ने अनेक तर्कों एवं सरल उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि पर-वस्तु केवल ज्ञेय (जानने योग्य) है, ज्ञान का स्रोत नहीं। इन्द्रियाँ ज्ञान के साधन हैं, स्रोत नहीं, तथा मन भी स्वयं जानने योग्य है, जानने वाला नहीं। उन्होंने कहा कि ज्ञान बाहर से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं, बल्कि आत्मा का स्वभाव है। बाह्य साधन केवल उसके प्रकट होने के निमित्त बनते हैं।
व्याख्यान में उन्होंने श्रोताओं से आत्मचिंतन का आह्वान करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन भर संसार को जानने में लगा रहता है, किंतु स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करता। वास्तव में धर्म की यात्रा बाहर से भीतर की ओर लौटने की यात्रा हड्डै, जहाँ ज्ञाता स्वरूप आत्मा का अनुभव होता है।
इस अवसर पर धर्मप्रेमी श्रद्धालु उपस्थित रहे। व्याख्यान के उपरांत श्रोताओं ने जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया तथा आत्मस्वरूप के विषय में विस्तृत चर्चा हुई।