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विश्वमंगल की सामूहिक चेतना है शिव तत्त्व : प्रो. नीरज शर्मा

By Goapl Gupta · 18 Feb 2026 · 6 views
विश्वमंगल की सामूहिक चेतना है शिव तत्त्व : प्रो. नीरज शर्मा



उदयपुर जनतंत्र की आवाज विवेक अग्रवाल। सुविवि के संस्कृत विभाग में आज विजया एकादशी को महाशिवरात्रि के उपलक्ष्य में "शिव-तत्त्व-समर्चना और भारत-बोध" विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में शिव की उपासना और राष्ट्रीय चेतना के अंतर्संबंधों पर विमर्श किया गया। गोष्ठी के आरंभ में उपस्थित शिक्षकों और विद्यार्थियों ने आदि शंकराचार्य रचित 'शिव मानसपूजा स्तोत्र' का सामूहिक पाठ किया तथा शोधार्थी पं. रवि सुखवाल ने शुक्ल यजुर्वेद के 'रुद्र सूक्त' का पारायण किया।

गोष्ठी में मुख्य उद्बोधन देते हुए संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. नीरज शर्मा ने भारत के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, साहित्य और अध्यात्म के संदर्भ में शिवतत्त्व की व्यापकता को रेखांकित किया। प्रो. शर्मा ने कहा कि शिव का अर्थ है कल्याण, मंगल और शुभता। विश्वमंगल या लोककल्याण पूर्वक आत्मकल्याण की भावना भारतबोध की विशेषता है। विश्व का भरण-पोषण और रक्षण भारत शब्द के मूल में है। जो रिक्तता या अपूर्णता को परिपूर्ण और संपूर्ण कर दे वह भारत है। भगवान भोलेनाथ की उपासना अपूर्णता को संपूर्णता में बदल देती है। देश के अलग- अलग कोनों में स्थापित बारह ज्योतिर्लिंग हमारी हजारों साल की एकता के कालजयी प्रतीक हैं। कैलाश, पशुपति और केदारनाथ से लेकर सेतुबंध रामेश्वर तक पूरे भारतीय प्रायद्वीप के कण-कण में शिवजी विराजमान है। शब्द और अर्थ की भांति भवानी और शंकर दोनों परस्पर अभिन्न हैं। शुभता की निरन्तरता के लिए शक्ति का भी होना जरूरी है। 52 शक्तिपीठ हमें संगठित और शक्तिसंपन्न बनने की प्रेरणा देते हैं। पूरब की बहने वाली गंगाजी और पश्चिम की बहने वाली नर्मदाजी दोनों का महादेव से नित्य संबंध है जो भारतवर्ष की जीवनी शक्तियाँ है। हर- हर गंगे और नर्मदे हर का स्वर हमें अभय और आनन्द से भर देते हैं। सिन्धुघाटी में मिली मुद्रा पर भगवान पशुपति अंकित हैं। महाकवि कालिदास ने पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच महाभूतों के साथ सूर्य, चन्द्रमा और विश्वमंगल के लिए आहुति प्रदान करने वाले यजमान को शिवजी की प्रत्यक्ष मूर्ति कहा है। सच्चिदान्द के रूप में शिवतत्व का विस्तार जीवात्मा से विश्वात्मा और परमात्मा तक मौजूद है। यही भारतबोध हमारा आत्मबोध या स्व का बोध भी है जो व्यष्टि से समष्टि तक सामूहिक चेतना को शिव तत्त्व के रूप में पूजता है।

कार्यक्रम समन्वयक डॉ. जी.एल. पाटीदार ने भगवान् शिव को राष्ट्रीय चेतना का संवाहक बताया। संयोजक डॉ. मुरलीधर पालीवाल ने संस्कृत सुभाषितों के माध्यम से 'भारत' शब्द की व्याख्या की। जो निरंतर भा अथवा ज्ञान की खोज में लगा हुआ है वह भारत है। संपूर्ण विश्व को ज्ञान से प्रकाशित करने भगवान शंकर हैं।

आयोजन के लिए कुलगुरु प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत ने संदेश के माध्यम से अपनी शुभकामनाएँ दी। इस अवसर पर आयुर्वेद कॉलेज के सेवानिवृत्त आचार्य डॉ. श्रीराम शर्मा सहित संकाय सदस्य डॉ. राजू सिंह, डॉ. नीता त्रिवेदी, डॉ. संगीता अठवाल, डॉ. सुरेश सालवी, श्री दिनेश जोशी, श्री जगन्नाथ पालीवाल सहित विभाग के शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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