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जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का मेवाड़ से रहा है संबंध

By Goapl Gupta · 02 May 2026 · 19 views
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का मेवाड़ से रहा है संबंध

उदयपुर विवेक अग्रवाल। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग और वेदांत भारती बेंगलुरु के तत्वावधान में सिंधु-भवन जवाहरनगर में भगवत्पाद जगद्गुरु शंकराचार्य और मेवाड़ विषय पर विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया । गोष्ठी में यडतोरे योगानन्देश्वर मठ के अध्यक्ष और वेदान्त भारती के संस्थापक श्रीशंकरभारती महास्वामी ने सान्निध्य प्रदान किया। श्री शंकरभारती महास्वामी द्वारा भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने वाले जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के तत्कालीन भारत यात्रा-मार्ग और उनके प्रवास-स्थानों का इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति, पांडुलिपि और लोकस्मृति में मौजूद साक्ष्यों के आधार पर सर्वेक्षण एवं शोध कर वहाँ शांकर ज्योति-स्थल चिह्नित करने का कार्य किया जा रहा है। इसी क्रम में आयोजित विचारगोष्ठी में मुख्यवक्ता इतिहासकार डॉ श्रीकृष्ण जुगनू ने कहा कि मेवाड़ के प्राचीन इतिहास में राशि और रावल का प्रमुख स्थान रहा है। डॉ. जुगनू ने देवालय प्रतिष्ठा शिलालेख में उत्कीर्ण आम्नाय शब्द एवं एकलिंग पुराण, देवीपुराण, वायु पुराण आदि अनेक ऐतिहासिक, पौराणिक के आधार पर 8 वीं- 9 वीं शताब्दी में मेवाड़ में जगद्गुरु शंकराचार्य के व्यापक प्रभाव को रेखांकित किया।
विशिष्ट अतिथि शांतिपीठ के अनन्तगणेश त्रिवेदी रहे जिन्होंने अमरखजी आदि अनेक प्राचीन शैव मंदिरों की प्रतिष्ठा में भी शंकराचार्य की परंपरा का प्रभाव माना। संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. नीरज शर्मा ने बताया कि जगद्गुरु शंकराचार्य के दक्षिण से उत्तर या द्वारिका से पुष्कर अथवा उत्तर-पूर्व दिशा के यात्रा मार्ग में तत्कालीन प्राचीन मेवाड़ में अवश्य उनका प्रवास हुआ होगा। मेवाड़ के शैव मंदिरों सहित जनजातीय और नगरीय दोनों की समाज- संस्कृति पर लोक परंपरा पर शंकर का प्रभाव है। कुलगुरु प्रोफेसर भगवती प्रसाद सारस्वत ने ऑनलाइन माध्यम से शुभकामनाएं देते हुए आगामी शंकराचार्य जयंती पर मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में ‘जगद्गुरु शंकराचार्य और प्राचीन राजस्थान’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन का संकल्प व्यक्त किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की ओर से श्री शंकरभारतीजी का अभिनन्दन किया गया। डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने एकलिंगपुराण भेंट किया। संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ मुरलीधर पालीवाल ने गोष्ठी का संयोजन किया। वेदांत भारती की ओर से श्रीधर हेगडे ने प्रतिभागियों का अभिनंदन कर आभार ज्ञापित किया।

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