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कोई आहट कोई सद़ा ही नहीं, क्या कोई शहर में बचा ही नहीं... - आकाशवाणी के संगीत समारोह में ग़ज़लों में डूबते गए संगीत रसिक

By Goapl Gupta · 15 May 2026 · 167 views
कोई आहट कोई सद़ा ही नहीं, क्या कोई शहर में बचा ही नहीं...
- आकाशवाणी के संगीत समारोह में ग़ज़लों में डूबते गए संगीत रसिक
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उदयपुर संवाददाता विवेक अग्रवाल। शहर के एमएलएसयू अतिथि गृह स्थित बप्पा रावल सभागार में शुक्रवार की शाम गीत और ग़ज़लों की ऐसी सरिता बही कि संगीत के रसिक डूबते चले गए। मौका था भारत का लोक प्रसारक ‘आकाशवाणी’ की स्थापना के 90 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित आकाशवाणी उदयपुर की ओर से ‘आकाशवाणी@90 संगीत समारोह’ का। दिन ढलते-ढलते शुरू हुए संगीत समारोह में गायक डॉ. देवेन्द्रसिंह हिरन और डॉ. पामिल मोदी ने देर रात तक श्रोताओं को स्वर और शब्दों के मोह में बांधे रखा।

इस अवसर पर आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के उपमहानिदेशक एवं क्लस्टर प्रमुख राजेंद्र नाहर ने बताया कि आकाशवाणी ने विगत 90 वर्षों में देश की सांस्कृतिक चेतना, लोक परंपराओं एवं जनसंचार को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जन-जन की आवाज़ बनकर आकाशवाणी ने संगीत, साहित्य, समाचार एवं सामाजिक सरोकारों को निरंतर नई ऊंचाइयाँ प्रदान की हैं।पूरे देश में आयोजित किए जा रहे ये संगीत समारोह न केवल आकाशवाणी की समृद्ध विरासत का उत्सव हे , बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय संगीत एवं प्रसारण परंपरा से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास भी सिद्ध होंगे।

कार्यक्रम का आगाज उपमहानिदेशक एवं क्लस्टर प्रमुख-राजेन्द्र नाहर , सहायक निदेशक -निर्मल पुरोहित, , कार्यक्रम प्रमुख-विनोद कुमार शर्मा , सहायक अभियंता-दुर्गा शंकर मेवाड़ा एवं विनोद कुमार बारबर, कार्यक्रम अधिशाषी-गजेन्द्र सिंह राठौड़ एवं मनोज कुमार हंसराज अम्बेश ने दीप प्रज्वलित करके किया। उपमहानिदेशक एवं क्लस्टर प्रमुख राजेंद्र नाहर ने मुख्य कलाकारों को गुलदस्ता भेंट किया वहीं सहा. निदेशक (अभि.) निर्मल पुरोहित और कार्यक्रम प्रमुख विनोद कुमार शर्मा ने संगीत कलाकारों का माल्यार्पण किया। समारोह में आग़ाज़ गायक डॉ. देवेन्द्रसिंह हिरन ने अपनी संगीतबद्ध की हुई ग़ज़लों से किया तो श्रोताओं को एक नया मुकाम मिला। उन्होंने शायर शमीम जयपुरी की गज़ल ‘इश्क पे जब शबाब होता है, सारा आलम शराब होता है...’, राहत इंदौरी की ‘सारी फितरत तो नकाबों में छिपा रखी थी, सिर्फ तस्वीर उजालों में छिपा रखी थी...’ और शायर जलाल अहमद की ग़ज़ल ‘कोई आहट कोई सद़ा ही नहीं, क्या कोई शहर में बचा ही नहीं...। ग़ज़लों पर श्रोता दाद देने से चूक नहीं पाए।
समारोह में डॉ. पामिल मोदी ने शुरुआत में शायर शुजा खावर की ग़ज़ल ‘सात सुरों का बहता दरिया’ सुनाकर भाव विह्वल कर दिया। डॉ. मोदी ने ‘आईए बैठिये आमने-सामने...’, ‘कूनकू फैल गई बात शतासाई की..’ और ‘गम का खजाना तेरा भी है, मेरा भी’ पेश करके श्रोताओं को संगीत सरिता में डूबकियां लगाने को मजबूर कर दिया। समारोह में संगीत प्रेमियों से सभागार खचाखच भरा नजर आया।

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