मधुर वाणी और मर्यादित व्यवहार ही सफल जीवन की पहचान : मुनिश्री आदित्य सागर ’श्री’ और ‘जी’ जैसे सम्मानसूचक शब्द हमारी संस्कृति और संस्कार के प्रतीक, गुरूदेव ने परिवार में प्रेम-सौहार्द बनाए रखने का दिया संदेश
By Goapl Gupta ·
15 Jul 2026 ·
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मधुर वाणी और मर्यादित व्यवहार ही सफल जीवन की पहचान : मुनिश्री आदित्य सागर
’श्री’ और ‘जी’ जैसे सम्मानसूचक शब्द हमारी संस्कृति और संस्कार के प्रतीक, गुरूदेव ने परिवार में प्रेम-सौहार्द बनाए रखने का दिया संदेश
उदयपुर संवाददाता विवेक अग्रवाल। हिरणमगरी सेक्टर-11 स्थित आदिनाथ भवन में आयोजित प्रात:कालीन धर्मसभा में परम पूज्य श्रुतसंवेगी महाश्रमण मुनिश्री आदित्य सागर जी महाराज ने सफल जीवन, मधुर वाणी और मर्यादित व्यवहार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को जीवनोपयोगी संदेश दिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की पहचान उसके विचारों, व्यवहार और वाणी से होती है तथा मधुर और संयमित भाषा ही परिवार और समाज में प्रेम, सम्मान एवं सौहार्द का आधार बनती है।
अपने प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि संसार में सभी लोग जीवन जीते हैं, लेकिन जीवन को सार्थक और सफल बनाने की कला हर किसी को नहीं आती। जीवन की सफलता व्यक्ति के संस्कार, आचरण और शब्दों पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि बोलते समय शब्दों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि शब्द ही रिश्तों को जोड़ते हैं और शब्द ही उन्हें तोड़ भी सकते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को मर्यादित, मधुर और संस्कारित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। कटु वचन, अपशब्द और गाली-गलौज सभ्य समाज की पहचान नहीं हैं। सच्चा जैन वही है जिसकी वाणी संयमित, विनम्र और मर्यादित हो तथा जिसके शब्द दूसरों के मन में सम्मान, विश्वास और अपनत्व का भाव उत्पन्न करें।
पारिवारिक जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और हित के लिए कभी-कभी उन्हें डांटते हैं, लेकिन बच्चे उसे गलत समझकर नाराज हो जाते हैं और कई बार अपशब्दों का प्रयोग भी कर बैठते हैं। यह उचित नहीं है। माता-पिता की डांट के पीछे सदैव स्नेह, चिंता और कल्याण की भावना होती है। इसी प्रकार गुरु भी शिष्य के व्यक्तित्व निर्माण और आत्मकल्याण के लिए अनुशासन का पालन करवाते हैं।
उन्होंने कहा कि साधु-संत और गुरु सदैव सहनशीलता, करुणा और मर्यादित वाणी का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य समाज को सही दिशा देना, संस्कारवान बनाना और सरल, संयमित एवं सदाचारी जीवन की प्रेरणा देना होता है।
प्रवचन के अंत में मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान समय में सम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। बातचीत में ‘श्री’ और ‘जी’ जैसे सम्मानसूचक संबोधनों का प्रयोग हमारी संस्कृति, संस्कार और विनम्रता का परिचायक है। यदि हम अपनी वाणी में मधुरता, सम्मान और मर्यादा को स्थान दें, तो परिवार और समाज में प्रेम, सद्भाव और सौहार्द का वातावरण स्वत: निर्मित होगा।
चातुर्मास समिति अध्यक्ष अशोक शाह ने बताया कि प्रात:कालीन शुभ बेला में मुनिश्री आदित्य सागर जी महाराज के सानिध्य में भगवान श्रीजी का शांतिधारा पंचामृत अभिषेक संपन्न हुआ। इस अवसर पर पारस चित्तौड़ा, अशोक शाह भंवर मुणडलिया राजेश देवड़ा चन्द्र प्रकाश कारवां प्रमोद कुमार चोधरी गुरु सेवा संघ केलाश चित्तौड़ा पारस सिंघवी सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे और धर्मलाभ प्राप्त किया। धर्मसभा से पूर्व गुरु भक्तों द्वारा दीप प्रज्वलन, शान्ति लाल जी भोजन सर्व ऋतु विलाश समाज में प्राप्त किया ।मुनिश्री के पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट महावीर प्रसाद सीघवी प्राप्त किया। मंच संचालन मदन देवड़ा किया। जैसे मांगलिक आयोजन संपन्न हुए। सभा के अंत में सभी श्रावक-श्राविकाओं ने गुरु भक्ति कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
मंगलवार प्रात: काल से मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज संघ सहित नगर भ्रमण पर रहेंगे। मंगलवार को प्रवास सर्व ऋतु विलास महावीर जिनालय में रहेगा। प्रात:काल 7:00 बजे मुनिश्री का विहार होगा ।