ShubhBhaskar
JANTANTRAKI AWAZ
E Paper

संसार का मूल कारण शरीर नहीं, मैं शरीर हूँ की मान्यता है — डॉ. निलेश शास्त्री

By Goapl Gupta · 15 Jul 2026 · 13 views
संसार का मूल कारण शरीर नहीं, मैं शरीर हूँ की मान्यता है — डॉ. निलेश शास्त्री

उदयपुर संवाददाता विवेक अग्रवाल। श्री 1008 चंद्रप्रभ दिगंबर जैन चैत्यालय, मुखर्जी चौक में डॉ. निलेश शास्त्री के नियमित प्रवचन एवं स्वाध्याय क्रम के अंतर्गत मैं शरीर कैसे बन गया? विषय पर एक चिंतनपरक एवं शास्त्रसम्मत प्रवचन आयोजित किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं एवं धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर आत्मतत्त्व के इस गूढ़ विषय का लाभ प्राप्त किया।
प्रवचन के प्रारम्भ में डॉ. निलेश शास्त्री ने श्रोताओं के समक्ष कई विचारोत्तेजक प्रश्न रखे। उन्होंने पूछा कि यदि हमारा वास्तविक स्वरूप आत्मा है, यदि आत्मा ज्ञानस्वरूप और चेतन द्रव्य है, तो हम स्वयं को शरीर क्यों मानते हैं? क्या वास्तव में आत्मा शरीर बन गई है, अथवा यह केवल हमारी मान्यता है? इन प्रश्नों के माध्यम से उन्होंने श्रोताओं में गहन जिज्ञासा उत्पन्न करते हुए विषय का क्रमिक विवेचन किया।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि आत्मा कभी शरीर नहीं बनती। आत्मा अनादि-अनंत, चेतन एवं ज्ञायक द्रव्य है, जबकि शरीर जड़ एवं परिवर्तनशील है। यदि आत्मा वास्तव में शरीर बन जाती, तो उसका नित्य स्वरूप नष्ट हो जाता, जो कि आगम और तत्त्वज्ञान के पूर्णत: विपरीत है। इसलिए वास्तविकता यह नहीं कि आत्मा शरीर बन गई है, बल्कि यह है कि जीव ने शरीर में 'मैं' की बुद्धि कर ली है। यही मिथ्यात्व और संसार के बंधन का मूल कारण है।
उन्होंने समयसार के सिद्धांतों का सरल, तार्किक एवं प्रभावशाली शैली में विवेचन करते हुए रस्सी-साँप, अभिनेता तथा मकान जैसे उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि वस्तु कभी नहीं बदलती, बदलती है केवल मान्यता। जिस प्रकार अंधकार में रस्सी को साँप समझ लेने से रस्सी साँप नहीं बन जाती, उसी प्रकार शरीर को मैं मान लेने से आत्मा शरीर नहीं बन जाती। भूल केवल दृष्टि और मान्यता की होती है।
प्रवचन के दौरान डॉ. शास्त्री ने आचार्य कुन्दकुन्ददेव, आचार्य अमृतचन्द्र तथा आचार्य जयसेन के वचनों का उल्लेख करते हुए एकत्व-मोह की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने कहा कि संसार का कारण शरीर नहीं है, बल्कि शरीर के साथ मैं की मिथ्या एकता स्थापित कर लेना ही जीव के बंधन का मूल कारण है। जब जीव स्वयं को शरीर से पृथक ज्ञायक-द्रष्टा आत्मा के रूप में अनुभव करना प्रारम्भ करता है, तभी सम्यग्दर्शन का उदय होता है और मोक्षमार्ग का द्वार खुलता है।
उन्होंने आगे कहा कि वस्तु बदलने से संसार नहीं बना, बल्कि मान्यता बदलने से संसार बना है। अत: मुक्ति भी वस्तु बदलने से नहीं, बल्कि मान्यता बदलने से ही संभव है। जिस क्षण जीव की 'मैं शरीर हूँ की भ्रांति समाप्त होकर मैं शुद्ध ज्ञायक आत्मा हूँ' का अनुभव जागृत होता है, उसी क्षण उसके आध्यात्मिक जीवन की वास्तविक यात्रा प्रारम्भ होती है।
प्रवचन के समापन पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने विषय की गहनता, तार्किकता एवं सहज प्रस्तुति की सराहना करते हुए इसे आत्मचिंतन के लिए अत्यंत प्रेरणादायी बताया तथा नियमित स्वाध्याय एवं प्रवचन श्रृंखला से जुडऩे का संकल्प व्यक्त किया।

More News

Share News

WhatsApp

X

Facebook

Telegram

Instagram

YouTube