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भक्तामर विधान की भक्ति में डूबा शीतल धाम, 151 से ज्यादा जोड़ो ने लिया धर्म लाभ

By Goapl Gupta · 19 Jul 2026 · 6 views
भक्तामर विधान की भक्ति में डूबा शीतल धाम, 151 से ज्यादा जोड़ो ने लिया धर्म लाभ

सफल जीवन का मूल मंत्र है सज्जनता और सबको साथ लेकर चलने की भावना : मुनि श्री आदित्य सागर

रविवार को आयड चैत्यालय से प्रातः शोभायात्रा के साथ शीतल धाम पहुंचे मुनिश्री आदित्य सागर जी

उदयपुर संवाददाता जनतंत्र की आवाज विवेक अग्रवाल। आयड चैत्यालय में विराजे मुनिश्री आदित्य सागर जी महाराज ससंघ रविवार प्रातः 6:00 बजे शोभा यात्रा के साथ बिहार करते हुए खाराकुआं स्थित शीतलधाम में पहुंचे। पारस चित्तौड़ा ने बताया कि यहां पर मुनि संघ का समाजजनों द्वारा भव्य स्वागत एवं अगवानी की गई। मनी सैनी इस दौरान सभी को आशीर्वाद देते हुए मंगल कामना की।

इसके बाद आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा में श्रुतसंवेगी मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने सफल जीवन के सूत्र बताते हुए कहा कि सज्जनता और सभी को साथ लेकर चलने की भावना ही व्यक्ति को वास्तविक सफलता दिलाती है। उन्होंने कहा कि धन, पद और वैभव तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ सज्जनता भी हो। यदि व्यक्ति के पास सब कुछ हो, लेकिन सज्जनता का गुण न हो, तो उसका वैभव भी व्यर्थ हो जाता है।

मुनिश्री ने कहा कि सज्जन व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वह सभी को साथ लेकर चलता है। समाज और संघ की वास्तविक शक्ति भी उसी व्यक्ति के पास होती है, जिसमें सबको जोड़ने और साथ लेकर चलने की क्षमता होती है। जो व्यक्ति यह सोचता है कि वह अकेले ही सब कुछ कर लेगा, वह कभी स्थायी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। सामूहिक भावना से कार्य करने पर सफलता सरल भी होती है और कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो कार्य एक व्यक्ति आठ घंटे में करता है, वही कार्य सभी मिलकर मात्र एक घंटे में पूरा कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि सज्जन व्यक्ति बनने के लिए सबसे पहले सहनशीलता आवश्यक है। सज्जन बनने की यात्रा विनम्रता से शुरू होती है। पहले स्वयं को झुकाना पड़ता है, सबकी बातें सुननी पड़ती हैं और फिर सभी को साथ लेकर आगे बढ़ना पड़ता है। यही गुण व्यक्ति को समाज में विशिष्ट और सम्मानित स्थान दिलाते हैं।

मुनिश्री ने पौधे का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार पौधा पहले अपनी जड़ों को धरती में मजबूत करता है, उसके बाद ही ऊपर बढ़ता है, उसी प्रकार व्यक्ति को भी अपने संस्कार, विनम्रता और सज्जनता की जड़ों को मजबूत करना चाहिए। पेड़ की सुंदरता उसके पत्तों से दिखाई देती है, लेकिन उसका वास्तविक आधार उसकी जड़ें होती हैं। यदि जड़ें कमजोर हो जाएं तो पूरा वृक्ष नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार जीवन में सज्जनता और सामूहिकता की भावना कमजोर पड़ जाए तो व्यक्ति का व्यक्तित्व भी टिक नहीं पाता।

मुनि श्री ने कहा कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो सभी को साथ लेकर चलता है। जब सभी मिलकर कार्य करते हैं तो गलतियों की संभावना भी कम हो जाती है, क्योंकि एक-दूसरे की कमियों को समय रहते सुधारा जा सकता है। जो व्यक्ति सबको जोड़कर चलता है, वही सज्जनों की श्रेणी में आता है, जबकि अकेले चलने और दूसरों से दूरी बनाने की प्रवृत्ति व्यक्ति को दुर्जनों की ओर ले जाती है। बिखरकर कोई भी समाज या व्यक्ति सफल नहीं हो सकता।

पारस चित्तौड़ा ने बताया कि बताया कि प्रातःकालीन बेला में भगवान की शांतिधारा एवं अभिषेक सहित विभिन्न मांगलिक आयोजन संपन्न हुए, जिनमें बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने पुण्य लाभ प्राप्त किया। धर्मसभा से पूर्व मुनिश्री के पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट एवं आरती के मुख्य आयोजन हुए। सम्पूर्ण मांगलिक आयोजनों के दौरान सुरेश चंद्र पद्मावत, पवन नाकोली वाला, भाविक गुड़िया , अमित चित्तौड़ा, कपील पद्मावत मोहित भगत , ओमप्रकाश तितरडीया, राजकुमार गुड़िया की प्रमुख भूमिका रही। ।

भक्तामर महामंडल विधान में 151 से अधिक जोड़ों ने लिया धर्मलाभ

सुरेश पद्मावत ने बताया कि शीतलधाम वाटिका में दोपहर को भक्तामर विधान प्रारंभ हुआ। इस दौरान श्रद्धा, भक्ति और आस्था का ऐसा ज्वार उमड़ा कि पूरा शीतल धाम भक्ति भाव में डूब कर श्रीजी के जयकारों से गूंज उठा। श्रीजी का अभिषेक करने विधान धारियों में होड़ मच गई। भक्तामर महामंडल विधान आराधना में सौधर्म आदि 7 प्रमुख इंद्रों सहित 151 से अधिक जोड़ों ने श्रद्धापूर्वक सहभागिता की। विधान के दौरान सभी श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से पूजन-अर्चन कर अर्घ्य समर्पित किये l पंडित धरणेन्द्र शास्त्री ने मंत्रोच्चार के साथ विधि-विधानपूर्वक अनुष्ठान संपन्न करवाया और धर्मलाभ अर्जित किया। भक्तामर विधान के विधानाचार्य धर्मेन्द्र कुमार जैन थे।

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