सूर्य उपासना का महापर्व- मकर संक्रान्ति*
By Goapl Gupta ·
13 Jan 2026 ·
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*सूर्य उपासना का महापर्व- मकर संक्रान्ति*
*दृश्य पंचांगों की गणना से भगवान भुवन भास्कर 14 जनवरी को अपराह्न में और सौर पंचांगों गणना से भी 14 जनवरी को सूर्यास्त के बाद मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं।*
*शास्त्रीय व्यवस्था है कि जब मकर संक्रांति दिन में अरकती तो उसी दिन और जब सूर्यास्त के बाद अरकती है तो दूसरे दिन स्नान-दान करना चाहिए।*
*अतः स्पष्ट है दृश्य गणना से 14 जनवरी को और सौर गणना से 15 जनवरी को संक्रान्ति के स्नान-दान का माहात्म्य है।*
*प्रश्न पैदा होता है कि धर्मप्राण जनता संक्रान्ति दृश्य पंचांगों में दी 14 जनवरी की मानें या सौर पक्षीय पंचांगों में दी 15 जनवरी की मानें। मकर संक्रान्ति का विशेष स्नान, दान-पुण्य कब करें?*
*ऐसी विसंगति में विद्वज्जनों का सामुहिक निर्णय विशेष महत्व रखता है।*
*वैसे प्रयागराज में माघ मेले का मकर संक्रांति स्नान व पुण्य काल 15 का है। क्योंकि वहां कुम्भ स्नान, दान-पुण्य व्रतोपवास आदि सौर पक्षीय पंचांगों के अनुसार ही सुनिश्चित किये जाते हैं।*
राजस्थान में 99 प्रतिशत पंचांग दृक् पक्षीय हैं। इसलिए 14 को ही समीचीन माना जा रहा है।
कुछ वर्षों से दोनों पद्धतियों में वैमत्य बना रहता है। 2027 - 2028 में तो बिना किसी विरोधाभास के 15 जनवरी को ही संक्रान्ति मनाएंगे हम सब। क्योंकि तब सभी सिद्धान्तों से मकर संक्रान्ति सूर्यास्त बाद अरकेगी तो दान-पुण्य स्वत: ही दूसरे दिन होंगे।
*मैंने सन् 2060 तक की सङ्क्रान्ति तिथि की शोधपरक गणना इस लेख में दी है।*
*सङ्क्रान्ति परिभाषा-*
*रवे: संक्रमणं राशौ सङ्क्रान्तिरिति कथ्यते।*
भगवान भुवन भास्कर या किसी भी ग्रह का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश ही "संक्रान्ति" कहलाता है। सरल शब्दों में राशि परिवर्तन का नाम सङ्क्रान्ति है।
*सूर्य बुध शुक्र एक माह में, चन्द्रमा सवा दो दिन में, मंगल डेढ़ माह में, बृहस्पति तेरह महीने में, शनि अढ़ाई वर्ष में और राहु केतु डेढ़ वर्ष में राशि परिवर्तन करते हैं। अर्थात् दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं। भौमादिक पञ्चतारा ग्रह गतिभेद से समय पूर्व राशि परिवर्तन करते रहते हैं।*
*सूर्य निरयन और सायन दो प्रकार से गतिशील रहते हैं। निरयन पद्धति से प्रायः 14 अप्रेल को प्रत्यक्ष कर्मसाक्षी भुवन भास्कर मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करते हैं। वही मेष संक्रान्ति कहलाती है।*
सूर्य एक माह में एक राशि को भोगते हैं। इस प्रकार सूर्य प्रति माह एक एक राशि को भोगते हुए प्रायः 14 जनवरी को धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते रहे हैं।
*कतिपय विद्वान् कह रहे हैं कि अब से आने वाले सत्तर - अस्सी साल तक मकर संक्रान्ति 15 जनवरी को ही आएगी। सम्भवतः ज्योतिष विषय उन पण्डितमानियों का विषय नहीं है। ऐसे प्रलापों से सनातनी मान्यताओं पर आक्षेप लगने लगते हैं और समाज में विद्वज्जन ब्राह्मण उपहास के पात्र बनते हैं।*
*अधुना सौर पद्धति से दो साल बाद दो वर्ष तक और दृश्य पद्धति से तीन साल बाद चौथे वर्ष तो प्रायः 15 जनवरी की संक्रान्ति आती है। परन्तु लगातार 15 जनवरी की संक्रान्ति अभी नहीं आएगी।*
*सौर और दृश्य दोनों पक्षों से आने वाले सन् 2060 में मकर संक्रान्ति 15 जनवरी 2060 गुरुवार को सूर्योदय बाद अरकेगी यह सुनिश्चित है।*
*सूर्य भगवान इस वर्ष दृश्य गणितीय पंचांग से सूर्य 14 जनवरी बुधवार को अपराह्न तीन बजे बाद धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। दिन में संक्रमण के कारण संक्रान्ति सम्बन्धित स्नान व दान-पुण्य करना 14 जनवरी बुधवार को ही श्रेयस्कर रहेगा।*
*संक्रमण से 16 घटी पूर्व और 16 घटी बाद तक दिन में पुण्यकाल रहेगा। लगभग पौने नौ बजे से सूर्यास्त तक संक्रान्ति संबंधित दान पुण्य कर सकते हैं।*
विशेष-
*सौर पक्षीय पंचांगों में इस बार मकर संक्रांति सूर्यास्त बाद अरकने के कारण संक्रांति का पुण्य काल, संक्रांति स्नान, तीर्थराज प्रयाग में माघी स्नान 15 जनवरी गुरुवार को ही विशेष महत्व रखता है।*
*सौर पद्धति से रात्रि में संक्रान्ति अरकने संक्रांति का पुण्यकाल 40 घटी बाद तक अर्थात् 15 जनवरी को सूर्योदय से एक बजे तक श्रेयस्कर होगा।*
क्योंकि जब भी सूर्यास्त के बाद, प्रदोषकाल बाद या मध्य रात्रि बाद सूर्य उत्तरायण मकर राशि में प्रवेश करें तो अगले दिन संक्रमण से 16 घंटे तक पुण्यकाल कहा गया है।
शास्त्रकारों ने अन्य राशियों की संक्रान्तियों का पुण्यकाल पृथक् पृथक् कहा है।
मकर सङ्क्रान्ति पुण्य काल के शास्त्रीय निर्णय।
यथा-
*यद्यस्ते वा प्रदोषे वा निशीथे मकरं गते।*
*भास्करे तूत्तरदिनं पुण्यमित्याह माधव:।*
अर्थात् जब सूर्यास्त के समय, प्रदोषकाल में अथवा मध्यरात्रि में भगवान भुवन भास्कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो उत्तर अर्थात् अगले दिन पुण्याह काल होगा।
और भी कहा है -
*प्रदोषे वार्द्धरात्रे वा तथा भोग: परेऽहनि।*
और भी कहा है -
*प्रदोषे वार्द्धरात्रे वा तथा पुण्यं दिनान्तरम्।*
और भी कहा है-
*भविष्यत्ययने पुण्यमतीते चोत्तरायणे*
धर्म ग्रंथों में मेष राशि से लेकर मीन तक सभी संक्रान्तियों के लिए पुण्य काल सुनिश्चित किया है -
*मध्ये दानं विषुवति दक्षिणे वैष्णवे पुरा।*
*षडशीतिमुखेऽतीते व्यतीते चोत्तरायणे।*
*इत्येष निर्णयो दाने संक्रान्तौ हवनेषु च।।*
अर्थात् मेष और तुला की संक्रान्ति का पुण्यकाल संक्रमण के दोनों ओर 16-16 घटी, दक्षिणायन की कर्क संक्रान्ति और विष्णुपद- स्थिर राशियों- वृष सिंह वृश्चिक कुम्भ का पुण्यकाल संक्रमण से पहले, षडशीति अर्थात् द्विस्वभाव राशि मिथुन कन्या धनु मीन राशि की संक्रान्तियों में संक्रमण से पूर्व और उत्तरायण की मकर संक्रांति का दान-पुण्य संक्रमण के बाद ही श्रेयस्कर है।
और भी कहा है -
*मकरे त्रिंशदुत्तरा:।*
और भी-
*अतीते उत्तरे नाड्य इति प्राह: पुराविद:।*
स्पष्ट है जो सौर पक्षीय पंचांगों के पक्षधर हैं वे 15 जनवरी गुरुवार को और जो दृश्य पंचांगों के पक्षधर हैं वे 14 जनवरी बुधवार को संक्रांति स्नान एवं दान पुण्य करेंगें और अन्तिम निर्णय विद्वज्जनों का ही स्वीकार्य है।
भारत वर्ष के विद्वत् समाज में विशेष रूप से दृश्य और सौर गणितीय पञ्चांगों की ही मान्यता है। ब्रह्म पक्षीय पंचांगों की भी मान्यता है।
*सूर्य संक्रान्ति के सन्दर्भ में सौर और दृश्य सिद्धान्तों की गणना में लगभग 15 घटी अर्थात् छह घण्टे का अन्तर रहता है। इस अन्तर का मूल आधार भगणादि से आगत भिन्न भिन्न वर्षमान हैं।*
प्रत्येक राशि में दृश्य गणनानुसार सूर्य संक्रमण सौर गणना से लगभग 15 घटी पहले होता है और अनन्त काल तक पहले ही होता रहेगा।
*राशि प्रवेशकाल ही संक्रमण का मुख्यकाल कहलाता है। इस मुख्यकाल के सूक्ष्मतर होने के कारण शास्त्रकारों ने इससे पूर्वापर तीस बत्तीस तैंतीस या चालिस घटियां पुण्यादिक हेतु गौणकाल के रूप में स्वीकार की हैं।*
मकर संक्रान्ति के मुख्य संक्रमण काल के साथ ही खर मास अर्थात् मल मास समाप्त हो जाता है और विवाहादि शुभकार्य प्रारम्भ हो जाते हैं।
बृहस्पति की धनु व मीन राशि में सूर्य के आने पर वर्ष में दो बार मल अर्थात् खर मास आता है जो शुभ कार्यों में त्याज्य है।
इसी प्रकार प्रति बारह वर्ष बाद सूर्य की सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश करने पर स्थान विशेष पर सिंहस्थ सूर्य को शुभकार्यों में वर्जित कहा है।
विशेष रूप से संक्रमण का गौण काल मुख्य संक्रमण काल से सोलह घटी पूर्व और सोलह घटी पश्चात अर्थात् छह घंटे चौबीस मिनट पहले और छह घंटे चौबीस मिनट बाद तक माना जाता है। यही गौण काल सामान्यत: मेषादिक सभी संक्रान्तियों के पुण्यकाल के रूप में स्वीकार्य है।
ब्रह्मसिद्धान्तकार ने साढ़े सोलह-साढ़े सोलह कुल तैंतीस घंटियों का गौण पुण्यकाल कहा है।
*सौरपक्षीय पंचांगों के अनुसार 14 जनवरी को सूर्यास्त बाद मकर संक्रमण हो रहा है अतः स्नान पुण्यादिक कर्मों के लिए मुख्य काल एवं गौण काल दोनों ही 15 जनवरी गुरुवार को अभिहित हैं।*
शास्त्रों की मान्यता है कि उत्तरायण मकर राशि का संक्रमण यदि सूर्यास्त के बाद होता है तो अगले आधे दिन तक अर्थात् स्थान विशेष के दिनमान के मध्य तक संक्रान्ति का पुण्य काल रहेगा। यहां सोलह घटी के पुण्यकाल की व्यवस्था नहीं रहेगी क्योंकि यहां दिनार्ध मुख्य पक्ष है।-
*रात्रौ संक्रमणे पुण्यं दिनार्द्धं स्नान-दानयो:।।*
इसी प्रकार दक्षिणायन कर्क राशी का संक्रमण यदि सूर्यास्त के बाद होता है तो उसी दिन मध्याह्न से सूर्यास्त तक संक्रान्ति का पुण्य काल रहेगा। कर्क संक्रमण में मकर संक्रान्ति से विपरीत पक्ष है।
*बाबा विश्वनाथ की महानगरी- भारतवर्ष की आध्यात्मिक राजधानी काशी जी के साथ विश्व के अनेक पंचांग सौरपक्षीय हैं और वहां मकर संक्रान्ति सूर्यास्त के बाद अरकने से संक्रान्ति का स्नानादिक पुण्यकाल 15 जनवरी गुरुवार को ही शास्त्रीय कहा जाएगा।*
*दोनों पक्षों के वर्षमान-*
*दृग्पक्षीय वर्षमान 365 दिन 15 घटी 22 पल 57 विपल का माना जाता है।*
*और सौरपक्षीय वर्षमान 365 दिन 15 घटी 31 पल 30 विपल का माना जाता है।*
जो स्थूल हैं कालान्तर में इनका विशेष अन्तर प्रतिभासित होता रहता है।
*वैसे ज्योतिष में जितने भी सिद्धान्त ग्रन्थ हैं उनमें अधिकतम का अपना-अपना वर्षमान है। जब वर्षमान भिन्न हैं तो उनकी मान्यता वाले एक ही अक्षांश रेखांश के पंचांगों के तिथ्यादिमानों में अन्तर स्वाभाविक है।*
कुछ पंचांगों ने संक्रान्ति का पुण्यकाल 14 व 15 दोनों दिन का लगाया है। धर्म प्राण समाज में विभ्रम पैदा होता है संक्रान्ति का पुण्य काल 14 को माने या 15 को ? यह वैमत्य बढ़ता ही जा रहा है।
इस वैमत्य के रहस्य को समझने के लिए पहले हमें दृश्य वर्षमान 1/15/22/57 और सौर वर्षमान 1/15/31/30 को समझना होगा। और जब तक इनका अन्तर समझ में नहीं आएगा यह वैमत्य चलता ही रहेगा।
विशेष मान्यता -
*वैसे सूर्यसिद्धान्त को ज्योतिष का परम वेद कहा गया है अतः उसके वचन कम से कम धार्मिक निर्णयों में तो हमारे लिए परम पथप्रदर्शक होने ही चाहिएं।*
*सौरेण कुर्याद् व्रतयज्ञदीक्षाम्...*
और भी-
*देवकार्याणि सौरत: ...*
और भी-
*व्रतानामेव सर्वेषां सौरेणैव विनिर्णय:।*
*संक्रान्ति के दिन करणीय कर्म्म -*
संक्रान्ति के दिन विशेष स्नान, तीर्थ स्नान, गंगासागर स्नान, माही स्नान, पितृतर्पण, पितृ श्राद्ध, हवन, देव पूजा आदि करने का विधान है।
इस दिन सप्तधान्य से तुलादान, तिल, तैल से बने खाद्य पदार्थ, ऊनी व सूती वस्त्र, कम्बल, खिचड़ी, भोजन, घी, लवण, पंचरत्न, भूमि, गाय, गायों के लिए चारा-पानी, गुड़, पंचगव्य आदि का दान करना चाहिए।
लकड़ी और अग्नि-बिजली संबंधित दान भी उत्तम कहे हैं।
समर्थ हों तो सद्पात्र को दशविध महादान भी करने चाहिएं।
रात्रि में दान पुण्य वर्जित कहा गया है।-
*रात्रौ स्नानं न कूर्वीत दानं चैव विशेषतः।*
*नैमित्तिकस्तु कुर्वीत स्नानं दानं च रात्रिषु।।*
और भी कहा है-
*विवाह व्रत संक्रान्ति प्रतिष्ठा ऋतु जन्मसु।*
*तथोपराग पातादौ स्नाने दाने निशा शुभा।।*
सूर्य के समान अन्य ग्रहों का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश भी संक्रांति कहलाता है। मेषादि द्वादश राशियों में प्रवेश के कारण सभी ग्रहों की 12-12 संक्रान्तियां होती हैं।
*द्वादशैव समाख्याता: समा: संक्रान्तिकल्पना:।*
कल्पना: = भेदा:।
सूर्यादि ग्रहों के राशि संक्रमण काल से पूर्वापर की कुछ घटिकाएं शुभकार्यों में वर्जित कही गई हैं। और यही घटियां दान-पुण्य के लिए विशेष पुण्यदाई मानी गयी हैं।-
मु.चि.वि.प्र-
*देवद्वयंकर्तवोष्टाष्टौ नाड्याऽंका: खनृपा: क्रमात्।*
*वर्ज्या: सङ्क्रमणेऽर्कादे: प्रायोऽर्कस्यातिनिन्दिता:।।*
*अतिनिन्दितानाड्योऽतिपुण्यदा:।*
जबकि महर्षि जैमिनि ने कुछ भेद कहा है-
*नाड्यश्चतस्र: सपला: कुजस्य*
*बुधस्य तिस्रोमनव: पलानि*
मु.चि. के अनुसार सूर्य-३३, चन्द्रमा-२, मंगल-९, बुध-६, बृहस्पति-८८, शुक्र-९ और शनि-१६० की घटियां विवाहादि शुभ कार्यों में वर्जित हैं यही घटियां संक्रान्ति का पुण्यकाल कही गई हैं।
संक्रांतियों की विशेष संज्ञा-
मेष तुला (चरस्वभाव) राशियों की संक्रान्ति *विषुव संज्ञक।*
वृष सिंह वृश्चिक कुम्भ (स्थिरस्वभाव) राशियों की संक्रांति *विष्णुपद संज्ञक।*
मिथुन कन्या धनु मीन (द्विस्वभाव) राशियों की संक्रांति *षडशीतिमुख संज्ञक कही गयी हैं।*
कर्क और मकर (चरस्वभाव) राशियों की संक्रांति *अयन संज्ञक कही गयी हैं।*
जिनमें *कर्क संक्रान्ति दक्षिणायन संज्ञक* और *मकर संक्रान्ति उत्तरायण संज्ञक है।*
इस बार निरयन मकर संक्रान्ति तो 14 जनवरी को ही है। सौर पद्धति से चौदह जनवरी की रात्रि में भगवान भुवन भास्कर उत्तरायणगामी हो रहे हैं। सायन मकरार्क प्रायः 21 दिसम्बर को होते हैं। उस दिन से भी उत्तरायण अभिहित है।
*उत्तरायण मकर संक्रान्ति पर्व- सूर्य उपासना का महापर्व है।*
भारत वर्ष के भौगोलिक स्वरूप के लिए मकर संक्रान्ति का पर्व महापर्व इसलिए भी है कि इस दिन से सूर्य दक्षिण दिशा से हमारी ओर उत्तर दिशा में आगमन की शुरुआत करते हैं।
इसी दिन से देवताओं के दिन की शुरुआत भी होती है। छह माह का उत्तरायण देवताओं का एक दिन और छह माह का दक्षिणायन देवताओं की रात्रि कहे गये हैं।
*मकर संक्रान्ति पर्व सूर्य के विशेष आदर-सत्कार अगवानी और उपासना का महापर्व कहा जाता है।*
अब से ठीक छह माह बाद 16 जुलाई को सूर्य निरयन कर्क राशि में प्रवेश करते हैं तो दक्षिणायन प्रारम्भ हो जाता है।
सूर्य दक्षिण गामी होंगे और देव सो जाएंगे। सायन पद्धति से 21 जून को दक्षिणायन होता है।
सभी संक्रांतियों के पुण्य काल का विशेष महत्व है। संक्रमण का मुख्य काल अतिसूक्ष्म होने से अत्यल्प होता है अतः मनुष्य मात्र के लिए मुख्य संक्रमण काल में स्नान दान सम्भव नहीं है। इसलिए गौणकाल में ही पुण्य काल श्रेयस्कर कहा है।
यथा-
*संक्रांतिसमय: सूक्ष्मो दुर्ज्ञेय: पिशितेक्षणै:।*
पिशितेक्षणै: = मनुष्यै:।
*अत: मुख्यकालानुपलब्धौ गौणकालेऽपि कार्यम्।।*
संक्रांति के दिन स्नान और दान का ही विशेष महत्व है। स्नान कर सूर्य नमस्कार करने से शरीर अरोगता को प्राप्त होता है।
स्वस्थ और यशस्वी जीवन चाहने वालों को नित्य प्रति स्नान ध्यान कर सूर्य की सविता शक्ति गायत्री का प्रणमन करना चाहिए।
गायत्री आराधना ही सच्ची सूर्य आराधना है।
संक्रान्ति के दिन स्नान का विशेष महत्व देखिए-
*रविसंक्रमणे पुण्ये न स्नायाद्यदि मानव:।*
*सप्तजन्मसु रोगी स्याद्दु:खभागी हि जायते।।*
दान-पुण्य का महत्व देखिए-
*संक्रान्तौ यानि दत्तानि हव्यकव्यानि दातृभि:।*
*तानि नित्यं ददात्यर्क: पुनर्जन्मनि जन्मनि।।*
बारह संक्रान्तियों की संज्ञा-
*षडशीत्याननं चापनृयुक्कन्याझषे भवेत्।*
*तुलाजौ विषुवं विष्णुपदं सिंहालिगोघटे।।*
*सम्पूर्ण काल चक्र सूर्यापेक्षी है। अतः सौरमास का विशेष महत्व है- ऋतु अयन वर्ष कुम्भपर्व मकरादिपर्व विवाह उपनयनादि संस्कार विशेष स्नानदानादि सभी शास्त्रकारों ने सूर्य संक्रांति से सम्बद्ध माने हैं।*
*मेषादि सभी सूर्य संक्रांतियों में स्नान दान पुण्य आदि के काल का शास्त्रकारों ने विशद् विवेचन भी किया है। साथ ही संक्रान्ति पुण्यकाल में शुभ कार्यों हेतु विशेष वर्जना भी कही है।*
सूर्य से इतर ग्रहों की संक्रांति को साधारण माना है और सूर्य संक्रांति काल को अति निन्दित कहा है अतः गौण पुण्यकाल में तीर्थस्नान दानादिक करके समय को अनुकूल बनाना चाहिए।
मध्यम और स्पष्ट सूर्य के आधार पर संक्रान्तियों के सायन और निरयन दो प्रकार विहित हैं।
अयनांश युक्त स्पष्ट सूर्य की संक्रांति को सायन दृश्य या चल सूर्य संक्रांति कहा गया है। सूर्य संक्रांति में स्पष्ट सूर्य ही ग्रहण करते हैं मध्यम नहीं।
*धर्म दर्शन और ज्योतिष शास्त्रकारों ने अयनांश रहित निरयन सूर्य संक्रांति को ही शास्त्रीय मान कर तदनुसार उनके शुभाशुभ फल कहे हैं।*
नक्षत्र फल-
इस बार निरयन मकर संक्रमण अनुराधा नक्षत्र पर हो रहा है जिनका जन्म नक्षत्र अनुराधा है या जिनका प्रसिद्ध नाम न ना नि नी नु नू ने नै अक्षरों पर है उन्हें एक सौर मास तक रोग दोष क्लेश भय धनहानि के योग हैं।
जहां भी मकर संक्रान्ति के दिन वर्षा होती है उस क्षेत्र में अग्निभय रोगभय विस्फोट लूटपाट एवं वृष्टि से पीड़ा बढ़ती है।
निरयन सूर्य संक्रांति के साथ सायन सूर्य संक्रांति का भी अपना महत्व है।-
*स्नानदानजपश्राद्धव्रतहोमादिकर्मसु।*
*सुकृतं चलसंक्रान्तावक्षयं पुरुषोऽश्नुते।।*
और भी-
*सायनांशसंक्रान्ते: स्नानदानजपादावेव कार्यं न सर्वत्र।*
परन्तु विद्वानों ने निरयन संक्रान्ति को ही पुण्यदा कहा है-
*पुण्यदां राशिसंक्रान्तिं ...*
ऐसे शास्त्रीय वचन भी मिलते हैं कि मध्य रात्रि से पहले संक्रांति अरकती है तो पूर्व दिन में और मध्य रात्रि बाद सूर्य संक्रांति अरकती है तो अगले दिन दान-पुण्य का महत्व है। निशीथ अर्थात् मध्य रात्रि को संक्रान्ति अरकती है तो दोनों दिन ही संक्रान्ति निमित्त दान पुण्य शास्त्रों में विहित है।
*संक्रान्ति वास का ज्ञान-*
इस वर्ष रोहिणी वास समुद्र में होने से संवत का वास मालाकार के घर में होना सुखदायक है।
*संक्रान्ति वास नूतन वर्ष (संवत्सर) के लिए कहा गया है न कि मासिक मकर संक्रान्ति आदि के लिए। मेष संक्रान्ति के दिन से ही संक्रान्तिवास माना जाता है।*
*संक्रान्ति वास का मूल आधार रोहिणी वास है। वास चार जातियों के घरों में ही कहा गया है।*
आने वाले वर्ष में वृष्टि ज्ञान के लिए प्रायः 14 अप्रैल को होने वाली मेष संक्रान्ति के नक्षत्र से "रोहिणी वास" देखा जाता है।
रोहिणी वास समुद्र में हो तो माली के घर संक्रान्ति का वास कहा है- उस वर्ष महावृष्टि योग बनते हैं।
समुद्र के तट पर रोहिणी वास हो तो संक्रान्ति का वास रजक-धोबी के घर कहा है- उस वर्ष सुशोभना वृष्टि कही गई है।
समुद्र और पृथ्वी की संधि में रोहिणी वास हो तो संक्रान्ति का वास वैश्य के घर में कहा है- उस वर्ष खंडवृष्टि कही गई है।
पर्वत पर रोहिणी वास हो तो संक्रान्ति का वास कुम्हार के घर कहा गया है- तो उस वर्ष अल्पवृष्टि कही गई है।
मेष संक्रान्ति जिस नक्षत्र पर अरकती हैं उस नक्षत्र से अगले नक्षत्र को दूसरा मानते हुए रोहिणी नक्षत्र तक की गणना कर लें। उससे रोहिणी वास चार स्थानों में से एक पर होता है उसे ही विद्वान् पूरे वर्ष का संक्रान्ति वास कहते हैं।
मकर संक्रान्ति पर या जब भी नये पंचांग आते हैं तो गांवों में संक्रान्ति का वास पूछते हैं।
विज्ञजन पंचांग के पहले दूसरे पन्ने पर लिखे अनुसार बता देते हैं।
*संक्रान्ति 15 मुहूर्त 30 मुहूर्त या 45 मुहूर्त की कही जाती है जो संक्रमण नक्षत्र के अनुसार सुनिश्चित है। तदनुसार ही वास और मुहूर्तों का शुभाशुभ फल शास्त्रों में कहा गया है।*
विद्वज्जनों से विनम्र अनुरोध है आप जिस भी सिद्धान्त को मानते हैं तदनुसार ही माघ और संक्रान्ति के निमित्त स्नानादि निष्पादित करें।
चिन्तनीय है कि हम चौदह जनवरी को ही मकर संक्रान्ति आती है यह मानकर निर्णय नहीं करें। ऐसा सर्वदा नहीं होता है।
संक्रान्ति की विशेष शोधपरक तिथियां -
*मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि निम्न वर्षों में सौर-दृश्य या अन्य किसी भी सिद्धांत से मकर संक्रान्ति एवं उसका पुण्यकाल 15 जनवरी को ही होगी -*
*ईस्वी सन 2024, 2028, 2032, 2036, 2040, 2044, 2048, 2052, 2056, 2060 .....*
*और निम्न वर्षों में भी सभी सिद्धान्तों से मकर संक्रान्ति का पुण्यकाल 15 जनवरी को ही शास्त्र सम्मत है।*
*ईस्वी सन 2027, 2031, 2035, 2039, 2043, 2047, 2051, 2055, 2059 ....*
परन्तु विद्वानों के निर्णय में विसंगति रहेगी।
*सैद्धांतिक रूप से कहना चाहूंगा कि सन् 2060 में दृश्य पंचांगों के अनुसार मकर संक्रांति 15 जनवरी को 2 घटी 4 पल पर और सौर मकर संक्रान्ति 17 घटी 20 पल के लगभग अरकेगी। अर्थात् दोनों पद्धतियों से निर्मित पंचांग स्पष्ट रूप से 15 जनवरी 2060 को ही मकर संक्रान्ति मनाने के आदेश देंगे।*
शीतकाल में सर्वहिताय अग्नि जलाकर सबकी रक्षा करने से स्वर्ग में अप्सराएं मिलती हैं ऐसा वचन नरसिंह पुराण में मिलता है -
*शीतकाले महावह्निं प्रज्वालयति तो नर:।*
*सर्वसत्वहितार्थाय स्वर्गे चाप्सरसं लभेत्।।*
विशेष अनुरोध-
*खेद का विषय है कि आज ग्रेगोरियन कलैंडर सांसारिक मान्यता प्राप्त वर्षमानक बन चुका है। यह हमारे सूर्य की गति के आधार पर बने सौरवर्ष की ही प्रतिकृति है। और हमने हमारी सौर पद्धति को शास्त्रों तक ही सीमित रखा सार्वजनिक नहीं किया।*
*हमारा वैदिक ज्योतिषीय वर्षमान 1/15/31/30 (तीन सो पैंसठ सही एक बटा चार से कुछ अधिक समय) यही तो संदेश देता है कि 14 अप्रेल से मेषार्क मास से नया वर्ष प्रारम्भ होता है और इसका दशवां महिना मकरार्क 14 जनवरी को ही आता है। लीप ईयर की भांति हमारे भी अधिकमास और क्षयमास की व्यवस्था दी हुई है।*
*सर्वानन्दप्रदाता हरिहरनमित: पातु नो विश्वचक्षु:।*
पं. कौशल दत्त शर्मा
ज्योतिषाचार्य
सेवानिवृत्त प्राचार्य- संस्कृत शिक्षा
नीमकाथाना राजस्थान
9414467988