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राष्ट्रीय बालिका दिवस (24 जनवरी ) पर विशेष बालिकाएँ बोझ नहीं बहारें हैं -नफीस आफरीदी

By Goapl Gupta · 22 Jan 2026 · 24 views
राष्ट्रीय बालिका दिवस (24 जनवरी ) पर विशेष
बालिकाएँ बोझ नहीं बहारें हैं
-नफीस आफरीदी
किसी भी समाज की प्रगति का सही पैमाना यह होता है कि वह अपनी बालिकाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिस समाज ने भी बलिकाओं के प्रति अपना नज़रिया बदला है वहाँ बालिकाएँ बोझ नहीं बहारें बन गई और उन्होने अपने कौशल, बुद्धि और सोच से परिबर, समाज और देश का मस्तक ऊंचा किया है। बालिकाएँ केवल परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि समाज की निरंतरता, संवेदना और नैतिक चेतना का आधार होती हैं। फिर भी इतिहास के लंबे दौर में बालिकाओं के प्रति समाज की सोच समान, न्यायपूर्ण और सम्मानजनक नहीं रही। कभी उन्हें बोझ माना गया, कभी पराया धन समझा गया और कभी उनकी आकांक्षाओं को परंपरा के नाम पर दबा दिया गया।आज भारत एक परिवर्तनशील समाज है, जहाँ बालिकाओं के प्रति सोच धीरे-धीरे बदल रही है परंतु यह बदलाव अभी भी धीमा। प्राचीन भारतीय समाज में बालिकाओं की स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं थी। वैदिक काल में उन्हें शिक्षा का अधिकार प्राप्त था और वे बौद्धिक विमर्श में भाग लेती थीं। किंतु समय के साथ सामाजिक संरचना कठोर होती गई। मध्यकाल तक आते-आते बालिकाओं को घरेलू भूमिकाओं तक सीमित कर दिया गया। उनकी शिक्षा, स्वतंत्रता और निर्णय क्षमता को नियंत्रित किया जाने लगा। धीरे-धीरे समाज में यह धारणा गहराती गई कि बालिका परिवार पर आर्थिक बोझ है। उसका मुख्य उद्देश्य विवाह है और उसकी सुरक्षा के नाम पर उसकी स्वतंत्रता सीमित की जानी चाहिए। यहीं से बालिकाओं के प्रति नकारात्मक सोच की जड़ें मजबूत होती चली गईं।
पुत्र जन्म को वंशवृद्धि और सहारे का प्रतीक माना जाता है, जबकि बालिका जन्म को चिंता और जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है। इस सोच के पीछे लिंग अनुपात में असंतुलन,भ्रूण हत्या,बालिकाओं के प्रति उपेक्षा जैसी गंभीर समस्याएँ सामने आईं। हालाँकि कानून और जागरूकता अभियानों ने स्थिति में सुधार किया है, लेकिन मानसिकता का पूर्ण परिवर्तन अभी भी चुनौती बना हुआ है। आज अनेक माता-पिता बेटियों को समान या उससे अधिक शिक्षा दिलाने के पक्षधर हैं। फिर भी यह बदलाव पूरे समाज में समान रूप से नहीं पहुँचा है।
बालिकाओं के प्रति समाज की सोच में सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है । अक्सर कहा जाता है कि बालिकाओं की सुरक्षा के लिए उनकी आज़ादी सीमित करना आवश्यक है। इसके परिणामस्वरूप उनके पहनावे पर नियंत्रण,आने-जाने की पाबंदियाँ, सपनों और करियर पर रोक लगाई जाती हैं। बालिकाओं के प्रति समाज की सोच का सबसे कठोर रूप बाल विवाह में दिखाई देता है। हालाँकि यह कानूनन अपराध है, फिर भी कुछ क्षेत्रों में यह सामाजिक स्वीकृति के साथ जारी है।इन चुनौतियों के बीच समाज में कई सकारात्मक बदलाव भी दिख रहे हैं। आज बेटियों के जन्म पर उत्सव मनाया जा रहा है। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियान जागरूकता बढ़ा रहे हैं। बालिकाएँ शिक्षा, खेल और विज्ञान में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं।
मीडिया, साहित्य और सिनेमा में भी अब बालिकाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है।बालिकाओं के प्रति सोच के निर्माण में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।यदि परिवार समान अवसर दे,बेटा-बेटी में भेद न करे, बालिका की राय को महत्व दे तो समाज स्वतः बदलने लगता है।घर से शुरू हुआ परिवर्तन ही स्थायी सामाजिक बदलाव का आधार बनता है। शिक्षा और कानून सोच बदलने के औज़ार हैं। कानून बालिकाओं को अधिकार तो देता है, लेकिन सोच नहीं बदल सकता।सोच बदलने के लिए आवश्यक है कि नैतिक शिक्षा,लैंगिक समानता पर संवाद, स्कूलों में संवेदनशील पाठ्यक्रम पर अमल लिया जाए। जब बालक और बालिका दोनों को समान मूल्य सिखाए जाते हैं, तभी समाज में संतुलन आता है। आज का मीडिया समाज की सोच को आकार देने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। डिजिटल माध्यमों ने बालिकाओं को अपनी आवाज़ उठाने का मंच भी दिया है। वे अब केवल देखी नहीं जातीं, सुनी भी जाती हैं। वे दमखम के साथ आवाज़ उठा रही हैं। भविष्य का समाज वही होगा जो आज की बालिकाओं को सम्मान,अवसर, सुरक्षा के साथ स्वतंत्रता दे पाएगा।बालिकाओं को “संरक्षण की वस्तु” नहीं, बल्कि “समान अधिकार वाली नागरिक” के रूप में देखना होगा।
भारतीय बालिकाओं के कमाल की केवल कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की सशक्त कहानियाँ हैं। इससे सिद्ध है कि कम उम्र में भी बड़ी सोच और असाधारण साहस संभव है। हिमानी बुंदेला (उत्तर प्रदेश)ने दृष्टिबाधित होने के बावजूद सिविल सेवा परीक्षा पास कर यह दिखाया कि शारीरिक चुनौती कभी भी बौद्धिक क्षमता को सीमित नहीं कर सकती। उनका संघर्ष लाखों छात्राओं को आत्मविश्वास देता है। हर वर्ष कई गाँवों की छात्राएँ सीमित संसाधनों के बावजूद दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं में टॉप करती हैं। ये बालिकाएँ दिन में घरेलू काम और रात में पढ़ाई कर यह सिद्ध करती हैं कि मेहनत हालात से बड़ी होती है।
विज्ञान और नवाचार में भी बालिकाएँ आगे बढ़ रही हैं। अनन्या पांडे (स्कूल छात्रा, महाराष्ट्र) ने मात्र 14 वर्ष की आयु में जल संरक्षण से जुड़ा एक सस्ता उपकरण बनाया, जिसे राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी में सम्मानित किया गया। उनका उद्देश्य था—ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की बर्बादी रोकना।अटल टिंकरिंग लैब की छात्राएँ भी कमाल कर रही हैं।देशभर के स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब से जुड़ी बालिकाएँ रोबोटिक्स, कोडिंग और पर्यावरण समाधान पर काम कर रही हैं। कई छात्राओं के मॉडल अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचे हैं। खेल के मैदान में भी बालिकाओं का साहस अद्वितीय है। कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाली शेफाली वर्मा ने यह दिखाया कि प्रतिभा उम्र नहीं देखती। वे आज लाखों स्कूली लड़कियों के लिए रोल मॉडल हैं।राजस्थान की दिव्यांग अवनी लेखरा (शूटिंग) ने आगे चलकर ओलंपिक में पदक जीता, लेकिन उनका संघर्ष छात्र जीवन से ही शुरू हुआ। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आत्मविश्वास और अभ्यास से हर बाधा पार की जा सकती है।
बालिकाएँ सामाजिक बदलाव की मिसाल बन रही हैं। लक्ष्मी (राजस्थान) एक किशोर बालिका ने अपने गाँव में होने वाले बाल विवाह के खिलाफ आवाज़ उठाई और प्रशासन की मदद से इसे रोका। आज वह अन्य लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रेरित कर रही है।इसी तरह स्वच्छता अभियान चलाने वाली छात्राएँ कमाल कर रही हैं। कई स्कूलों की बालिकाओं ने अपने स्तर पर स्वच्छता, मासिक धर्म जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण अभियान चलाए हैं। ये बालिकाएँ समाज को संवेदनशील बना रही हैं।कला और साहित्य में भी छात्राओं की रचनात्मक उड़ान देखने लायक है। आज कई छात्राओं की कविताएँ, कहानियाँ और लेख अखबारों, पत्रिकाओं और डिजिटल मंचों पर प्रकाशित हो रही हैं। वे स्त्री संवेदना, समाज और प्रकृति पर सशक्त लेखन कर रही हैं।कई बालिकाओं ने मधुबनी, वारली और अन्य लोककलाओं को आधुनिक मंच देकर देश-विदेश में पहचान दिलाई है।
डिजिटल और तकनीकी क्षेत्र में ही वे कमाल कर रही हैं। 12-15 वर्ष की बालिकाएँ आज स्कूल स्तर पर ही ऐप डेवलपमेंट और कोडिंग सीख रही हैं। कुछ ने महिलाओं की सुरक्षा और शिक्षा से जुड़े ऐप्स भी बनाए हैं। ऑनलाइन शिक्षा से बालिकाएँ आगे बढ़ती दिखाई देती हैं। दूरदराज़ इलाकों की छात्राएँ ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं। यह डिजिटल भारत की सशक्त तस्वीर है।
भारतीय बालिकाओं के कमाल सचमुच बेमिसाल हैं। शिक्षा, विज्ञान, खेल, समाज सेवा, कला और तकनीक—हर क्षेत्र में वे अपनी पहचान बना रही हैं। ये बालिकाएँ आने वाले भारत की नींव हैं।
यदि हर बालिका को समान अवसर, सुरक्षा और प्रोत्साहन मिले, तो भारत न केवल विकसित राष्ट्र बनेगा, बल्कि संवेदनशील और न्यायपूर्ण समाज का भी निर्माण करेगा। आज की बालिका ही कल के भारत की दिशा तय करेगी। भारतीय बालिकाओं के कमाल केवल कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की सशक्त कहानियाँ हैं।स्कूली कवयित्रियाँ और लेखिकाएँ आज कई छात्राओं की कविताएँ, कहानियाँ और लेख अखबारों, पत्रिकाओं और डिजिटल मंचों पर प्रकाशित हो रहे हैं। वे स्त्री संवेदना, समाज और प्रकृति पर सशक्त लेखन कर रही हैं।
कई बालिकाओं ने मधुबनी, वारली और अन्य लोककलाओं को आधुनिक मंच देकर देश-विदेश में पहचान दिलाई है।आज कई छात्राएँ स्कूल स्तर पर ही ऐप डेवलपमेंट और कोडिंग सीख रही हैं। कुछ ने महिलाओं की सुरक्षा और शिक्षा से जुड़े ऐप्स भी बनाए हैं।दूरदराज़ इलाकों की छात्राएँ ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं—यह डिजिटल भारत की सशक्त तस्वीर है।
इस्से स्पष्ट होता है कि—प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। अवसर मिलने पर बालिकाएँ असाधारण कर सकती हैं । सही मार्गदर्शन और समर्थन से देश का भविष्य बदला जा सकता है। भारतीय बालिकाओं के कमाल सचमुच बेमिसाल हैं। शिक्षा, विज्ञान, खेल, समाज सेवा, कला और तकनीक—हर क्षेत्र में वे अपनी पहचान बना रही हैं। ये बालिकाएँ केवल सफलता की कहानियाँ नहीं, बल्कि आने वाले भारत की नींव हैं।यदि हर बालिका को समान अवसर, सुरक्षा और प्रोत्साहन मिले, तो भारत न केवल विकसित राष्ट्र बनेगा, बल्कि संवेदनशील और न्यायपूर्ण समाज का भी निर्माण करेगा।आज की बालिका ही कल के भारत की दिशा तय करेगी।बालिकाओं के प्रति समाज की सोच परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। पुरानी रूढ़ियाँ अभी पूरी तरह टूटी नहीं हैं, लेकिन नई चेतना जन्म ले चुकी है। जब समाज यह समझ लेगा कि बालिका कोई बोझ नहीं, बल्कि संभावनाओं का भंडार है—तभी वास्तविक प्रगति संभव होगी। जिस समाज में बालिकाएँ सुरक्षित, शिक्षित और सम्मानित होती हैं,वही समाज सच में सभ्य और विकसित कहलाता है। ####
नफीस आफ़रीदी, स्वतंत्र पत्रकार
राज विल, बी-70, प्रगति पथ,बजाज नागर, जयपुर-302015

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