मोटे अनाज से बढ़ेगा रोजगार: डबोक में विशेष प्रशिक्षण
By Goapl Gupta ·
31 Jan 2026 ·
10 views
मोटे अनाज से बढ़ेगा रोजगार: डबोक में विशेष प्रशिक्षण
उदयपुर संवाददाता जनतंत्र की आवाज विवेक अग्रवाल ।उदयपुर जिले के डबोक गाँव में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत संचालित परियोजना “मेवाड़ क्षेत्र की परंपरागत फसलों के प्रसंस्करणों का उत्कृष्टता केंद्र” के तहत पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम “मेवाड़ क्षेत्र की परंपरागत फसलों का प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन” का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों, ग्रामीण युवाओं तथा नवोद्यमियों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध परंपरागत फसलों के वैज्ञानिक प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं विपणन से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना रहा।
परियोजना प्रभारी डॉ. कमला महाजनी ने बताया कि मेवाड़ क्षेत्र में ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का जैसी मोटे अनाज की फसलें परंपरागत रूप से उगाई जाती रही हैं, किंतु लंबे समय तक इनके सीमित उपयोग के कारण किसानों को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया। वर्तमान समय में मोटे अनाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “न्यूट्री-स्मार्ट फूड” के रूप में पहचान मिलने से इनके प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन की अपार संभावनाएँ उभर कर सामने आई हैं। प्रशिक्षण में मोटे अनाज, हल्दी एवं अदरक के पोषणात्मक, औषधीय तथा स्वास्थ्य संबंधी लाभों पर विस्तार से व्याख्यान योगिता पालीवाल द्वारा दिया गया। उन्होंने बताया कि मोटे अनाज फाइबर, आयरन, कैल्शियम एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जो मधुमेह, हृदय रोग एवं कुपोषण जैसी समस्याओं के समाधान में सहायक हैं। साथ ही, हल्दी एवं अदरक के प्राकृतिक औषधीय गुणों, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में उनकी भूमिका तथा घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला गया।
प्रशिक्षण के तकनीकी सत्रों में अंकिता पालीवाल ने मोटे अनाज की बढ़ती राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार मांग, उपभोक्ता रुझानों तथा मूल्य संवर्धन से मिलने वाले अतिरिक्त आर्थिक लाभों की जानकारी दी। प्रतिभागियों को मोटे अनाज आधारित विभिन्न नवाचारात्मक उत्पादों जैसे मल्टीग्रेन आटा मिश्रण, चकली, लड्डू, कुकीज़, चॉकलेट, रेडी-टू-कुक मिक्स एवं रेडी-टू-ईट उत्पादों की विस्तृत जानकारी प्रदान की गई। इसके साथ-साथ नेहा शेखावत ने उत्पादों की गुणवत्ता, मानकीकरण, लेबलिंग एवं पैकेजिंग के महत्व पर भी चर्चा की गई।
इस पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका व्यावहारिक प्रशिक्षण रहा। प्रतिभागियों को मोटे अनाज, हल्दी एवं अदरक के प्रसंस्करण की आधुनिक तथा पारंपरिक तकनीकों का प्रत्यक्ष प्रदर्शन कराया गया। हल्दी एवं अदरक की सफाई, उबालना, ब्लांचिंग, सुखाना, पिसाई, छानना, पैकेजिंग एवं भंडारण की वैज्ञानिक विधियों के बारे में बताया गया। इसके अतिरिक्त, मोटे अनाज से बेकरी उत्पाद एवं पारंपरिक उत्पाद तैयार करने की प्रक्रियाओं का भी चरणबद्ध अभ्यास कराया गया, जिससे प्रतिभागियों को लघु उद्योग स्तर पर उत्पादन की व्यावहारिक समझ विकसित हुई।
कार्यक्रम के अंतर्गत सरकारी योजनाओं, उद्यमिता विकास एवं वित्तीय सहायता पर केंद्रित विशेष सत्रों का आयोजन किया गया। इन सत्रों में प्रतिभागियों को खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी विभिन्न केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं, अनुदान, सब्सिडी, बैंक ऋण, स्वयं सहायता समूह आधारित उद्यम, स्टार्ट-अप योजनाओं एवं विपणन सहायता के बारे में नेहा शेखावत द्वारा विस्तार से जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने यह भी समझाया कि किस प्रकार सीमित पूंजी में छोटे स्तर की प्रसंस्करण इकाइयाँ स्थापित कर किसान एवं महिलाएँ स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती हैं। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों के साथ संवादात्मक सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें उन्होंने अपनी जिज्ञासाएँ एवं व्यावहारिक समस्याएँ साझा कीं। अंकिता पालीवाल द्वारा उनके प्रश्नों का समाधान कर उन्हें व्यवसायिक योजना निर्माण, लागत-लाभ विश्लेषण एवं बाजार से जुड़ने के व्यावहारिक सुझाव दिए गए।
पाँच दिवसीय (27-31 जनवरी, 2026) इस प्रशिक्षण कार्यक्रम ने प्रतिभागियों को न केवल तकनीकी ज्ञान एवं कौशल प्रदान किया, बल्कि स्थानीय परंपरागत फसलों के माध्यम से सतत आजीविका सृजन, ग्रामीण रोजगार एवं उद्यमिता विकास के प्रति जागरूक भी किया। अंत में प्रतिभागियों ने ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में अत्यंत उपयोगी बताते हुए भविष्य में भी इस प्रकार के प्रशिक्षणों के नियमित आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम का समापन प्रतिभागियों को मोटे अनाज, प्रशिक्षण किट, प्रमाण पत्र वितरण एवं सकारात्मक अनुभव साझा करने के साथ हुआ।